बुधवार, 31 जनवरी 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - जनवरी, २०१८

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - जनवरी माह

नूतन वर्ष
जीवन में ले आए
हर्ष ही हर्ष
      बी पी प्रजापति
अभिनन्दन
नव वर्ष तुम्हारा
अतिथि देव
       नरेन्द्र श्रीवास्तव
अभी जन्मा है
जैसा चाहो ढाल लो
साल बच्चा है
       -राजीव गोयल
घर चौबारे
मेहनत के रंग
सजते द्वारे
       -बलजीत सिंह
दिन पहाड़
थक के सोई रात
स्वप्न देखती
      नरेंद्र श्रीवास्तव
लचक गई
हवा का रुख देख
बाल न बांका
       -सुरंगमा यादव
भोर से आस
सांझ से शिकायत
यही ज़िंदगी
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
वक्त कमबख्त
बदले करबट
वक्त बेवक्त
       -डॉ. रंजना
रस्सी सा ऐंठा
गुरूर में अकड़ा
आँखों से गिरा
       -सुरंगमा यादव
दंगा सुर्खियाँ ..
मुंह में रह गया
चाय का घूँट
       -विष्णु प्रिय पाठक
अनाथ बच्चा
मांगे की शर्ट छपा
"ओ मेरी मैय्या "
      विष्णु प्रिय पाठक
जन्म मरण
जीव का व्याकरण
आवागमन
       -निगम 'राज़'
सरे बाज़ार
अपहरित धूप
लोग मौन हैं
       दिनेश चन्द्र पाण्डेय
सागर तट
बालक बना रहा
रेत का घर
      -विष्णु प्रिय पाठक
विश्व हमारा
कुदरत का प्यारा
एक तोहफा
       -वलजीत सिंह
 घरों में उठीं
लालाच की लपटें
बहुएं जलीं
       -राजीव गोयल
शीत शर्बरी
रतिपति चलाए
कुसुम बाण
        *
शीत ऋतु में
नदी पे बन गए
बर्फ के पुल
       -सूर्य करण सोनी
नव वर्ष में
बदलें परिधान
वृक्ष महान
      *
भंवरे गाएं
पल्लवित पुष्पों पे
मधुर गान
        -सूर्य करण सोनी
खंगाला वक्त
चाँद हीरे यादों के
आ गए हाथ
     -राजीव गोयल
अंधेरी रात
कोहरे के व्यूह में
स्ट्रीट लाइट
       -विष्णु प्रिय पाठक
बरछी भाले
आत्मरक्षा की चाह
मौत हवाले
        -बलजीत सिंह
पतंग कटी
ऊंची उड़ान टूटी
धरा पे लुटी
       -निगम 'राज़'
गोधूलि वेला
समेट रहा रवि     
धूप के पर
         -राजीव गोयल
छूना आकाश
संघर्ष है कठिन
उडी पतंग
      *
नभ में देख
पतंगों की उड़ान
पक्षी हैरान
        -सुरंगमा यादव
शीत त्योहार
अलाव के सम्मुख
ठण्ड कथाएँ
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
मैंने जो रचा
सपनों का घरौंदा
वक्त ने रौंधा
       -सूर्य नारायण गुप्त
स्नेह का खेल
सरसों में लिपटी
मटर बेल
       -विष्णु प्रिय पाठक
मन तो रहा
मनमीत में डूबा
दर्द ही सहा
       -निगम 'राज़'
बीहड़ रास्ते
बेपरवाह नदी
मिलन धुन
      -सुरंगमा यादव
बड़ा खज़ाना
बीते हुए वक्त के
वो छोटे लम्हे
       -राजीव गोयल
शाम हो गई
ज़िंदगी का झमेला
लीजे समेट
         -डॉ. रंजना वर्मा
सूखी नदिया
भूखे प्यासे बगुले
टूटी उम्मीदें
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
आया बसंत
आगत स्वागत को
सजा निसर्ग
       दिनेश चन्द्र पाण्डेय
रंग उमंग
नवल कोपलों से
नव सृजन
      -प्रीती दक्ष
पवन बही
भंवर चूम रहे
सुमन सुख
      डा. रंजना वर्मा
बसंत ऋतु
दिन पतंग हुए
रात सरसों
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बसंतोत्सव
मदन साध रहा
पुष्पों के बाण
        -सुरंगमा यादव
बसंतोत्सव
ओढ़ पीली चूनर
झूमी सरसों
        -राजीव गोयल
शाल पलाश
रसवंती कामिनी
महुआ गंध
       -सुशील शर्मा
कोई न सगा
साथी बन सुख का
सब ने ठगा
      -सूर्य नारायण 'सूर्य'
सबका हक़
हमारा गणतंत्र
सबकी हद
       नरेन्द्र श्रीवास्तव
उनका भी हो
गणतंत्र दिवस
मोहताज जो
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
मैदान खाली
मोबाइल ले गया
बच्चों की गेंद
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
सांवरे बिन
नींद न आये चैन
न कटे रैन
      -डा. रंजना वर्मा
राष्ट्रीय पर्व
फेसबुक पे दिखे
तिरंगा ध्वज
      -विष्णु प्रिय पाठक
बहा ले गई
बचपन घरौंदा
वक्त लहर
      राजीव गोयल
सूर्यास्त हुआ
घर घर चमके
अपने सूर्य
      -सुरंगमा यादव
बादल ओट
हटा के चन्दा देखे
कितनी रात 
        सुरंगमा यादव
मौन ही सही
पुकारता तो रहा
अंतर-मन
        -प्रियंका वाजपेयी
खिल न पाई
मन की पूर्णमासी
लगा ग्रहण
        -प्रियंका वाजपेयी 
-----------------------------
---------------समाप्त ----

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - २०१७, दिसंबर माह

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु -२०१७, दिसंबर माह

तुम्हारा मन
चिड़िया सा चहका
मैं क्यों बहका
       -सुशील शर्मा
तुम्हारे लिए
रेत पर उकेरे
मन के भाव
       -सुशील शर्मा
दर्द छिपा है
मन में ऐसे,  जैसे
रेत में नमी
        -सुरंगमा यादव
पाषाण खंड
किनारे से निकली
हरित दूब
       विष्णु प्रिय पाठक

जुगल बंदी --
       *
थर्मामीटर
टेबल पर गिरा
ओस की बूँदें
       -विष्णु प्रिय पाठक
पारा सरीखे
ढलके अश्रु-बिंदु
कपोल भू  पे
       -डा. रंजना वर्मा
        *
शहर बड़ा
हर एक आदमी
अकेला खड़ा
        सुशील शर्मा
कशमकश
तुझे मैं याद रखूँ
या भूल जाऊं
        -सुशील शर्मा
नई कहानी
खुदा की मुझपर
मेहरबानी
        -निगम 'राज़
लफ्जों की लेखी'
रचती इतिहास
पढ़ती सदी
       -निगम 'राज़'
जागा संसार
गंध बाँट सो गया
हरसिंगार
      डा. शिवजी श्रीवास्तव
लगती भली
धूप अगहन की
माँ की गोद सी
       -शिव जी श्रीवास्तव
बनी कहानी
महकी रात भर
रात की रानी
        -निगम 'राज़'
लापरवाही
कागज़ न कलम
खरीदी स्याही
       -बलजीत सिंह
सत्संग हॉल
लाउडस्पीकर से
शान्ति का पाठ
         -अभिशेख जैन
दिव्यांग बाला
मुख से बना रही
हाथ का चित्र
        -विष्णु प्रिय पाठक
मन धरती
नव आशा अंकुर
लहक उठा
       -सुरंगमा यादव
भौरों का कोप
मुरझा गए फूल
डरी कलियाँ
        -अमन चांदपुरी
आंधी तूफ़ान
बादलों की ओट में
छिपा सूरज
        -शिव डोयले
मन नाविक
तन नौका लेकर
दौड़ता फिरे
       -सुरंगमा यादव
मन है ऐसा
निपुण निदेशक
नाच नचाए
       -सुरंगमा यादव
भट्टी की राख
ढूँढ़ते घूमे कुत्ते
ठण्ड में रोते
        सुरंगमा यादव
रश्मि के पैर
चल पड़े करने
धरा की सैर
        अभिषेक जैन
रवि ने बुना
किरणों के धागे से
धूप दुशाला
       -राजीव गोय
लक्ष्य विहीन
इत उत डोलती
जीवन नैया
       -सूर्य किरण सोनी
स्वर्ण रश्मियाँ
झिलमिल नदिया
दीपशिखा सी
        -सरंगामा यादव
शब्द कांटे भी
गुलाब के जैसे भी
छूकर देखें
         -नरेन्द्र श्रीवास्तव
नारी जीवन
आँगन की तुलसी
काशी मथुरा
       -शिव डोयले
आसमां परे
ज़रूर कुछ तो है
खोजे परिंदा
       जितेन्द्र वर्मा 
पूस की ठण्ड
रात खोजती रही
सूर्य दुशाला
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
ओढ़ रजाई
शाम से सोया सूर्य
उठा देर से
       सुरंगमा यादव
भाई है खूब
कतरा भर मिली
जाड़े की धूप
       -निगम 'राज़'
निर्मल जल
बहता कल कल
पर्वत पुत्र
      -डा. रंजना वर्मा
रहता रोता
बहता हुआ सोता
चुप न होता
        -डा. रंजना वर्मा
हम हैं तने
समय के सामने
विद्रोही बने
      -निगम 'राज़'
नाजों से पाला
पिजरा जब खुला
तोता जा उड़ा
        दिनेश चन्द्र पाण्डेय
तप में लीन
धवल वसन में
खड़ा  हिमाला
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
दस्तक भोर
उजालों ने उखाड़ी
रात कनात   
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
स्वाति बूंद-सा
प्रेम बना है मोती
मन सीपी में
      सुरंगमा यादव
बड़े ज्ञाता हो
मौन का अनुवाद
कर पाओगे  ?
      -पुष्पा सिन्धी
कैसी गरीबी
बदल लें नज़र
लोग करीबी
       -बलजीत सिंह
ढूँढे न मिले
गौरैया व आँगन
दोनों ही गुम
       -सुरंगमा यादव
छोटा जीवन
किन्तु महत्वपूर्ण
जैसे वसंत
       -निगम 'राज़'
सबको भाता
देहरी पे सूरज
जब भी आता
       -निगम 'राज़'
पिता का मन
मधुर नारियल
बाहर सख्त
       -सुरंगमा यादव
बर्फ सी सर्दी
धुनियाँ की दूकान
हुई सफ़ेद
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
विद्या विहीन
कुर्सी पर पसरे
हम ही चुनें
        -विष्णु प्रिय पाठक
भरने न दें
कलेजे के ज़ख्मों को
यादों के तीर
         -राजीव गोयल
सूप ज़िंदगी
दुःख नमक बिना
बड़ी ही फीकी
       -राजीव गोयल
पूस की रात
कम्पित दीप की लौ   
दादी के हाथ
         -विष्णु प्रिय पाठक
हर दीवाली
भगाया दरिद्दर
रहे निर्धन
       सुरंगमा यादव
तडपे प्यासी
एक स्वाति  के लिए
पानी में सीप
       -राजीव गोयल
ऋतु हेमन्त
प्रकोष्ठ में कांपती
गुलदावरी
        -विष्णु प्रिय पाठक
माँ के हाथ की
घी चुपड़ी पनेथी
यादों में शेष
        -सुरंगमा यादव
अम्मा का ख़त
आँख हो गई नम
सीली फिजाएं
       -राजीव गोयल
जलते बल्ब
रात पहाड़ पर
तारे जा  बसे
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
सूर्य को देख
अकेला चमकता
लाखों में एक
      बलजीत सिंह     
दौड़ती हुई
न जाने कहाँ चली
व्यस्त ज़िंदगी
        -प्रियंका वाजपेयी
मैके की याद
छौंक रही बहू
दाल के साथ
       -अभिषेक जैन
 जीवन पोथी
श्वेत पृष्ठ है कोई
कोई धूमिल
       -सुरंगमा यादव
जो स्मृतियाँ हैं
मन के आँचल में
तितलियाँ हैं
      - निगम 'राज़'
पुरवा आई
चन्दन वन से वो
खुश्बू लाई
        -सूर्य नारायण गुप्ता 'सूर्य'
गर्दन झुका
जोड़े मोबाइल में
अंजाने रिश्ते
        *
गर्दन तान
तोड़ देता अपने
पुराने रिश्ते
       - राजीव गोयल
नीरव रात
व्याकुल पुकारता
मन पपीहा
       -सुरंगमा यादव
पहाड़ यात्रा
सौन्दर्य की बारातें
नाचती आँखें
        दिनेश चन्द्र पाण्डेय
प्यारा सा गाँव
तालाब का किनारा
नीम की छाँव
       बलजीत सिंह

जुगल बंदी

ठूँठ पे बैठा
एक अकेला पक्षी
दोनों उदास
       सुरंगमा यादव
अकेला पंछी
रहेगा कब तक
ठूँठ के साथ ?
        -राजीव गोयल
---------------------
रेत बिखरी
सागर के किनारे
मोती न मिले
        डॉ रंजना वर्मा
पूस की धूप
जवानी से पहले
आया बुढ़ापा
        -सुरंगमा यादव
सैंटा की राह
मैया देखती रही
वृद्ध आश्रम
        - अभिषेक जैन
मर्यादा मान
लक्ष्मण रेखा जैसी
ना जाना लांघ
       -सूर्य किरण सोनी
मन पिघला
बह चली आँख से
करुणा धार
        -सुरंगमा यादव
कैसे बढाएं
अमन का क़दम
लुटे हैं जूते
        -विष्णु प्रिय पाठक
तीन तलाक़
हंसती ज़िंदगी से
किया मज़ाक़
       -भीम प्रसाद प्रजापति
छोटा अनार
हज़ार मोतियों का
उठाए भार
      -बलजीत सिंह
आंसू देकर
नींद हमारी लेकर
हा ! सोए तुम
       -सुरंगमा यादव

जुगलबंदी
-----------
लिख रहा हूँ
ज़िंदगी की किताब
वक्त के पन्ने
       शिव डोयले
लिख रही है
ज़िंदगी की किताब
वक्त की स्याही
        राजीव गोयल
-------------
भौरों ने गाया
फूल बनती गईं
कलियाँ सभी
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
म्यूजियम में
बनावटी पुतले
शहरी लोग
      -सुरंगमा यादव
नव डायरी
लिखूँ तेरा ही नाम
अधूरा ख़्वाब
       -विष्णु प्रिय पाठक
सरक रहा
छोड़ याद केंचुली
पुराना साल
       -राजीव गोयल
नव वर्ष में
करें नए संकल्प
बीती बिसार
         -सुरंगमा यादव
नव वासर
हर पल नवीन
बुनता साल
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय     
-------------------------------
------------------समाप्त ----

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - नवम्बर माह

नवम्बर माह के हाइकु

चल रही है
शरद आगमन
नशीली हवा
       *
नर्म हो रही
चिलचिलाती धूप
बर्फीली हवा
        -प्रियंका वाजपेयी
मिट्टी जो खुदी
परतों में दफ़न
महल मिला
       *
यादें अपनी
दफ्न मन में हुईं
ढूँढें न मिलीं
        -प्रियंका वाजपेयी 
अपना गाँव
झोंपड़ी झोंपड़ी को
देता सहारा
        *
गाँव हमारा
खंडहर हो गया
प्यार खडा है
        -विष्णु प्रिय पाठक
लूट ले गया
मेरा उम्र खज़ाना
वक्त लुटेरा
        -राजीव गोयल
डूबता चाँद
झील के उस पार
देवदास सा
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
उठने लगी
आँगन में दीवार
खामोश हम
       *
दीवार पार
भाई का परिवार
इधर हम
      -डा. रंजना वर्मा
धरा की पीड़ा
हिल गया पर्वत
बेफिक्र हम
       -विष्णु प्रिय पाठक
जीवन चाक
सुख दुःख की माटी
गढ़े आकृति
        -शिव डोयले
बदले चोले
रूप बदल गए
स्वरूप वही
       -राजीव गोयल
ऋतु बदली
भूला अपना शूल
केक्टस फूल
       -विष्णु प्रिय पाठक
बरछी भाले
आत्मरक्षा की चाह
मौत हवाले
       -बलजीत सिंह
सांध्य संगीत
गायों के गले बंधीं
घंटिया बजी
        -सुशील शर्मा
रास्ते बंजारे
घूमते यहाँ वहां
रुकें न कहीं
       -भावना सक्सेना
कैसा ज़माना
अपना ही खज़ाना
लूटें चाभियाँ
        -सूर्य नारायण 'सूर्य'
चलते रहे
छालों से भरे पाँव
राह न रुकी
        डा. रंजना वर्मा
नभ के तारे
तोड़ लाऊँगा सारे
देने सौगात
        -सूर्य किरण सोनी
छलक पड़ा
तट पर आते ही
नाव का दर्द
       -शिव डोयले
संजो के रखे
डायरी गुल्लक में
यादों के सिक्के
       -राजीव गोयल
तैरते रहे
झील सी अंखियों में
गुज़रे लम्हे
        -शिव डोयले
भूखा बालक
माँ गई है करने
रेसिपी क्लास
      -अभिषेक जैन
फूलों की झोली
बिखर जाने पर
बने रंगोली
      -वलजीत सिंह
प्रत्येक पौधा
पर्यावरण हेतु
बना है योद्धा
        -वलजीत सिंह
उड़ने लगे
शोहरत पाकर
खोखले लोग
      सूर्य कारन सोनी
ठंडी सुबह
दांतों के ताल पर
थिरके देह
       -राजीव गोयल
बाल दिवस
सफ़ेद हाथी पर
बच्चे सवार
       -विष्णु प्रिय पाठक
घनी नींद में
दादा के कंधे सटा
बाल दिवस
      -विभा श्रीवास्तव
रिहा हो गया
ठण्ड की पैरवी से
कैदी कम्बल
      -अभिषेकजैन
पर्वत बने
एकता में पत्थर
अटूट खड़े
       -सुशील शर्मा
मचाएं शोर
रात की खामोशी में
तुम्हारी यादें
        -राजीव गोयल
ध्रुम कोहरा
बच्चे, पिल्ले बिल्लियाँ
कुचले गए
       -विभा श्रीवास्तव
अटकी पड़ी
वायु प्रदूषण में
सांस की साँसें
         -अभिषेक जैन
सर्द लहर
निकलती रातों में
करे शिकार
       -राजीव गोयल
दर्पण कहे
स्वागत में तो रहो
कुछ न गहो
        -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
सर्द मौसम
गर्म चिता की राख
सो रहा श्वान
       -राजीव गोयल
मुस्काता  पौधा
लगता है बच्चों सा
आँगन मेरे
       सुशील शर्मा
वृद्ध आश्रम
वृद्धा के सिरहाने
बेटे की फोटो
       -अभिषेक जैन
मेरा शहर
हाथ में लिए आरी
छाँव तलाशे
       सुशील शर्मा
मेंहदी लिखे
तेरी हथेली पर
मेरा ही नाम
       -शिव डोयले
एक थी नदी
आने वाली पीढियां
सुने कहानी
        -सुशील शर्मा
दर्द का गीत
नयनों से बहता
भीगा दामन
        -डा. रंजना वर्मा
ठिठुरी हवा
भीगा पातों का गात
शीशिर रात
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
चांदनी रात
सितारों के आँगन
सजे बरात
         -वलजीत  सिंह
मन बगिया
कलरव करते
यादों के पंछी
        -सुरंगमा यादव
याद में तेरी
मुस्काई मैं, पगली
कहता जग
       -सुरंगमा यादव
मुनिया रूठी
घोड़े बने दादा जी
दुम हिलाते
         -विष्णु प्रिय पाठक
दब न सकी
तोड़ शिला का दर्प
मुस्काई दूब
         -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
शीत लहर
देती रही दस्तक
द्वार न खुले
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
पल रहे हैं
जाने कितने गम
हंसी के नीचे
        -राजीव गोयल
हुए अलग
पेड़ों से जब पत्ते
कुचले गए
       -राजीव गोयल
उदय-अस्त
सूर्य रहे समान
महापुरुष
       -सुरंगमा यादव
पानी बरसा
नथुनों में समाई
माटी की गंध
        -डा. रंजना वर्मा
बेटा बीमार
वृद्धाश्रम में पिता
है परेशान
       -राजीव गोयल
बाहर नहीं
भीतर ह्रदय में
बैठे हैं हम
        -सुशील शर्मा
फटी रजाई
छेदों भरा कम्बल
ठण्ड बैरन
       -डा. रंजना वर्मा
कपडे ढेर
किसी के पास, कोई
ठण्ड से ढेर
        -सुरंगमा यादव
देता है बलि
प्रभु की खुशी हेतु
मूर्ख मानव
          -सूर्य करण सोनी
ओस मानिंद
माथे पर झलके
श्रम का स्वेद
        -सुशील शर्मा
दादा की सांस
बारह पे कांपती
घड़ी की सुई \
        -विष्णु प्रिय पाठक
नई सुबह
पाई फिर हमने
करें सार्थक
      सुरंगमा यादव
चले ज़िंदगी
हथेली पर बनी
पगडंडी पे
       -राजीव गोयल
दिन की धूप
जाड़े ने खोल दिए
नींद के कोष
         -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
डर को भूत
मन में घुसो जैसे
हवा में जाड़ो
         (बुन्देली हाइकु) - सुशील शर्मा
रोता सावन
तर-बतर होता
मेरा दामन
       -निगम 'राज़'
टूटा बंधन
साथ निभाता जाए
अकेलापन
       -निगम 'राज़'
ढूँढ़ ही लाया
मन फिर जीने का
कोई बहाना
       -सुरंगमा यादव
चाहे जिसको
उसी पर झल्लाए
निष्ठुर मन
        -सूर्य करण  सोनी
थिरकी उषा
अमिया डार, कभी
दूब के सिर
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
मन हो गया
जहाज़ का पंछी
तुम से मिल
       -सुरंगमा यादव
सुबह शाम
दुनिया का व्यापार
दो दूनी चार
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय

जुगल बंदी

जीवन खेत
लहराते रिश्ते
स्नेह का पानी
     सुशील शर्मा
जीवन खेत
उगी प्यार फसल
उपजे रिश्ते
      -राजीव गोयल

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       -







 







मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु / अक्टूबर माह

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - अक्टूबर माह

मनाओ रोज़
पहली अक्टूबर
दिन वरिष्ठ
     डा. सुरेन्द्र वर्मा
दादा के ख़ास
किताबें चश्मा लाठी
ढेर दवाएं
     नरेन्द्र श्रीवास्तव
आई बरखा
पात पात हरखा
जीवन धन्य
     -डा. रंजना वर्मा
गिर जाते हैं
समय की शाखों से
उम्र के पन्ने
        -अमन चांदपुरी
पत्ते आश्रम
वर्षा-बूँदें ठहरें
तो कभी ओस
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
पल खुशी के
फूल पे बैठी ओस
भाग्य सराहे
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
गोधूलि वेला
समेटे सूरज ने
धूप के पंख
       -राजीव गोयल
शब्द ही शब्द
ढूँढ़ते हैं भीड़ में
अपने अर्थ
      -मनीषा सक्सेना
याद दरख़्त
कभी नहीं सूखता
होता सघन
       -डा. रंजना वर्मा
धूप ने दिए
धरती को जो ज़ख्म
छाँव ने सिए
        -राजीव गोयल
यह तुम हो
या चाँद पूनम का
हैरत में हूँ
       -शिव डोयले
पूनों की रात
बेकरार लहरें
छूने को चाँद
       -राजीव गोयल
दूध की खीर
है छत पर टंगी
मन अधीर
     सुशील शर्मा
ये जिंदगानी
क्षण भर की ही है
झूठी कहानी
       -सूर्य नारायण 'सूर्य'
घूँघट काढ़े
बदरी का दुपट्टा
आया है चाँद
       -जितेन्द्र वर्मा
चढती रात
ओर निखर आया
चाँद का नूर
       दिनेश चन्द्र पाण्डेय
भागता मन
विगत की गली में
यादें खोजता
       -शिव डोयले
शुभ्र धवल
नदिया में बहती
चन्द्र किरण
       -सुशील शर्मा
निकला चाँद
छलनी से बरसे
श्वेत किरण
      विष्णु प्रिय पाठक
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगड़ाई
      -वलजीत सिंह
जल-प्रपात
पृथ्वी को प्रकृति का
एक सौगात
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
भोर-किरण
शहनाई की धुन
बेटी हमारी
      -शिव डोयले
सर्द मौसम
पहाड़ ओढ़े खड़े
श्वेत कम्बल
      राजीव गोयल
कितनी बार
टहनी तोड़ डाली
फिर से उगी
      - तुकाराम खिल्लारे
उतरी रात
सांझ की सीढियों से
बिना आहट
      -राजीव गोयल
घट जाएगा
तम का ये पसारा
दीप हुंकारा
      -जगदीश व्योम
दीपक जला
हार कर अन्धेरा
पैरों में गिरा
      राजीव गोयल
सूर्य से होड़
करे सुबह का तारा
नभ चकित
       -जीतेन्द्र वर्मा
दीप प्रकाश
अँधेरे के रथ पे
छुए आकाश
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
ऊधो का देना
न ही माधों से लेना
घोंघे का सुख
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
बिखेरे जुल्फें
पहाड़ों से उतरी
सांवली रात
       -राजीव गोयल
नन्हे  बल्बों में
गुम हो गया दीया
तेल-गंघ भी
     -डा. जगदीश व्योम
रोशनी दी है
रंगीन झालरों ने
दीया उदास
      -निगम 'राज़'
फूटे पटाखे
दीप में भरा तेल
उछल पडा
      -विष्णु प्रिय पाठक
कल का पल
चला गया मुझसे
कर के छल
      -सूर्य नारायण 'सूर्य'
अकेला चाँद
देख रहा भू पर
फैला उन्माद
      -भीम प्रजापति
पीड़ा बरसी
आंसू से भर गईं
झील सी आँखें
      नरेन्द्र श्रीवास्तव
खुशी जो मिली
आंसू झट आ गए
यादें लेकर
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
यादों की नाव
मन के सागर में
गोते लगाए
      -राजीव गोयल
भूख से मौत
खबर सुनकर
रोटियाँ आयीं
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बाज़ार ऐसा
सलाह और धोखे
मिलते मुफ्त
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
अंधे बहरे
चीखती रही वह
देखा न सुना
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सखा कन्हैया
सिंगार संवारत
लेत बलैयां
       -प्रीती दक्ष
है भर जाता
त्यौहार दीवाली का
समरसता
       निगम 'राज़'
कर बस में
ख्वाहिशों का रथ
सारथी तू ही
       -राजीव गोयल
पंछी जुलाहा
तिनकों से बुनता
नीद की काया
       -राजीव गोयल
महल बड़े
गरीब दुखियों की
लाश पे खड़े
        -विष्णु प्रिय पाठक
वीरान आँखें
पहचान खोजती
बीते कल की
        -शिव डोयले
नज़रें मिलीं
अनकहे उतरी
दिल पे बात
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
शिशु गोद में
सपनों का संसार
माँ की आँखों में
         -नरेन्द्र श्रीवास्तव
मिटा फासला
मन घट ढलका
रस छलका
       -डा. रंजना वर्मा
मन हिरना
चहके दिन रात
धरे धीर ना
       -भीम प्रजापति
किया विकास
न्यू बुलेट पे बैठा
ग्राम प्रधान
       -विष्णु प्रिय पाठक
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समाप्त 

शनिवार, 30 सितंबर 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - सितम्बर माह

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - सितम्बर माह

मन दीवार
बीते सालों की खूँटी
पे यादें टंगी
      -राजीव गोयल
सत्य का पाँव
भटक रहा आके
झूठ के गाँव
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
सन्न था कागा
कूकी जो घोंसले में
काली काकली
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
बेजान बांस
स्पर्श कन्हाई का पा
जीवंत हुआ
       -राजीव गोयल
क्षितिज भाल
संध्या लगाती टीका
सूर्य सा गोल
       -शिव डोयले
शिक्षक देता
खुद को तपाकर
ज्ञान प्रकाश
       -डा. जगदीश व्योम
जागो इंसान
शिक्षा का आभूषण
बढाए मान
       -निगम 'राज़'
शिष्य आईना
शिक्षक का व्यक्तित्व
प्रतिबिंबित
       -सुशील शर्मा
मेहर गुरु की
बरसे बारिश सी
मिले संतुष्टि
       -डा. पूर्णिमा राय
अंधियारे से
गुरु करते सचेत
दें दिव्य ज्ञान
      डा. पूर्णिमा राय
गुरु जिसने
मिलाया ईश्वर से
उसे नमन
      -डा. रंजना वर्मा
ग़म गुप्त हो
और खुशी लुप्त हो
कौन तृप्त हो
       -सुशील शर्मा
शापित मन
इधर से उधर
भटके तन
       -राजीव 'राज़'
वर्षा थमी तो
नभ खोले खिड़की
सूरज झांके
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बढे कदम
अँधेरे मार्ग पर
मिले न छोर
       -सूर्य किरण सोनी
लम्बी सी जीभ
सड़कें चाट गईं
कई जंगल
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
बूढा मकान
दीवारों से झांकते
नीम पीपल
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
अंतर्मन में
गहरे उतरना
ध्यान करना
       -डा.रंजना वर्मा
गाते हैं पेड़
पाखियों के परों से
छूते आकाश
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
रौद्र लहर
आकर तट पर
हो जाती शांत
      -सूर्य करण सोनी
रात ने पिया
दिन का कोलाहल
हुई बेसुध
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
भोर हुई तो
रात जाकर छुपी
दिया के तले
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
शब्दों के रत्न
सजते पन्नों पर
बनाती नज़्म
      -राजीव गोयल
पा गए ठांव
पर्वतों की गोद में
पहाडी गाँव
      -सूर्य नारायण 'सूर्य'
शान है हिन्दी
भारत की जुबान
हिन्दी महान
       -भीम प्रसाद प्रजापति
शिव मस्तक
शोभित अर्ध चन्द्र
शोभा अनूप
       डा. रंजना वर्मा
यमुना तीरे
हंसता हुआ चाँद
कृष्ण का रास
       -डा. रंजना वर्मा
नदी का नीर
धक्के खा किनाकों से
सहता पीर
       -भीम प्रसाद प्रजापति
मुस्काए तुम
बन गई ग़ज़ल
शायर फिजां
       -प्रियंका वाजपेयी
कभी व्योम में
तलाशा वजूद को
कभी खो दिया
      - प्रियंका वाजपेयी
फूलों की घाटी
हरे-भरे पहाड़
धरा की थाती
       -सूर्यनारायण गुप्ता
पेड़ ने ओढी
पत्तियों की छतरी
मिला सुकून
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
ऊंचे पहाड़
डर के भागी नदी
नीचे ही नीचे
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
पड़ी फुहार
प्रसन्न हुआ मन
बूंदों ने छुआ
       -शिव डोयले
मेरा व्यापार
आनंद का बाज़ार
सारा संसार
       निगम 'राज़'
मन उमंग
स्वार्थ की भीड़ देख
हो गया दांग
      सूर्य नारायण गुप्त
फूलों की झोली
बिखर जाने पर
बने रंगोली
       -बलजीत सिंह
कातिल हैं वे
मसीहा भी लगते
मेरे ये दोस्त
       -सुशील शर्मा
पुराने पल
अलमारी में मिले
खतों में बंद
       -राजीव गोयल
बरखा विदा
तितलियाँ हाल पूछें
आके फूलों का
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
कैसा दस्तूर
बेगाने नज़दीक
अपने दूर
       -वलजीत सिंह
घड़ी की सुई
सदा चलायमान
किसकी हुई
       -भीम प्रसाद प्रजापति
खोजा जगत
रावण वध  हेतु
राम न मिला
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
नारी की व्यथा
द्रोपदी मीरा राधा
सीता की कथा
        -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'

रविवार, 20 अगस्त 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - अगस्त माह

अगस्त के श्रेष्ठ हाइकु-

मौन हैं जब
स्तब्ध सी धड़कने
अपने छूटे
     -प्रियंका वाजपेयी
धुलती धरा
उड़े सौंधी खुशबू
लौटा यौवन
      -प्रियंका वाजपेयी
बारूदी हवा
देश में ऐसी चली
रो उठी गली
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
चांदनी छाई
धरती पे चांदी की
पर्त बिछाई
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
वर्षा की बूँदें
शांत वातावरण
पत्तों पे बैठीं
      -अमन चांदपुरी  
सावन पर्व
मेंहदी रचे हाथ
देखे आईना
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सावन गीत
वर्षा की बूंदों संग
युगलबंदी
      नरेन्द्र श्रीवास्तव
बरसा पानी
प्यासी नदी ने पिया
जी भर पानी
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सज्जित व्योम
सितारों की चमक
लुभाती मन
       डा. रंजना वर्मा
आसमान में
मुस्कुराते पूर्वज
बनके तारे
       -प्रियंका वाजपेयी
उठा देरसे
आँखें मींचते हुए
शीत का सूर्य
       -अमन चाँदपुरी
सजी कलाई
बचपन की फोटो
राखी की यादें
        -डा. पूर्णिमा राय
श्रावणी पूनों
नेह कथा बांचते
रेशमी धागे
        -डा. शिवजी श्रीवास्तव
खुशी असीम
बहन की राखी में
शुभ सगुन
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
स्नेह बंधन
महकाए सम्बन्ध
बने चन्दन
      -मुकेश शर्मा
ज़िंदगी सच
दौड़ने का पर्याय
शान्ति मुहाल
       -प्रियंका वाजपेयी
रक्षा कवच
भाई की कलाई पे
रेशम धागा
      -सुशील शर्मा
सुनो ओ चाँद
निखर आए तुम
ग्रहण बाद  
      -सुशील शर्मा
सूर्य किरण
पृथ्वी पे यूं दौड़ी
स्वर्ण किरण
    -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
झूठ के पाँव
शहर से आ गए
हमारे गाँव
    सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
बिटिया रानी
छोटी सी उम्र में
हुई सयानी
     -सूर्य किरण सोनी
चलते रहे
रात दिवस पाँव
स्वप्न के गाँव
       -अमन चांदपुरी
चुरा ले गया
पतझर पाहुन
कपडे लत्ते
     डा. मिथलेश दीक्षित
लिपटी रही
सूखने के बाद भी
लता वृक्ष से
      -शिव डोयले
लूट ले गया
दरख्तों का वैभव
ये पतझड़
     राजीव गोयल
शाम ढलते ही
झालरें सितारों की
नभ में टंगी
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
ऊंचा होकर
छाया देने की कला
पेड़ से सीखो
       -अमन चाँदपुरी
फागुन मास
धरा पर चांदनी
करे विलास
       -बलजीत सिंह
ठंडी अंगीठी
गरीब के घर में
जुर्म पकाती
        -राजीव गोयाल
पंख पसार
निकले नभचर
नीड़ की और
       -सूर्य किरण सोनी
जन्म से शुरू
ज़िंदगी का दरिया
बहे ताउम्र
       -प्रियंका वाजपेयी
ठंडे सम्बन्ध
लगता जम गए
मुंह में शब्द
       -राजीव गोयल
देह धरा से
चुगे साँसों के मोती
समय हंस
        -शिव डोयले
मेरा जीवन
ज्यों लम्बी किताब
नीरस पन्ने
      -अमन चांदपुरी
बनूँ तिरंगा
लहराएगी आत्मा
चुकाऊँ ऋण
       -मुकेश शर्मा
जूझे गोपाल
आक्सीजन की हांडी
मिल न सकी
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
ज़रा ठहरो
महसूस तो करो
मौन का स्वर
      -डा. रंजना वर्मा
तन्हाइयों में
ले यादों की डोरियाँ
बुनूँ अतीत
       राजीव गोयल
कैसी आजादी
शरीफों के घरों को
 लूटें फसादी
        -सूर्य नारायण गुप्त "सूर्य"
नीला गगन
पहाड़ों की गोद में
दिखे मगन
        -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
नीयत सच्ची
मेहनत की रोटी
लगती अच्छी
       बलजीत सिंह
लूट के भागा
घर का सुख चैन
सोने का मृग
       -राजीव गोयल
डाली का फूल
नाज़ुक सी ज़िंदगी
करे कबूल
       -बलजीत सिंह
गीता कुरान
इनके नाम पर
चले दूकान
     -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
दुःख की आंच
ठहरे हुए आंसू
बहने लगे
      -शिव  डोयले
बादल रोया
आसमान का दर्द
धरा ने जाना
       शिव डोयले
छोड़ घोंसले
उड़ चले परिंदे
छूने गगन
        -राजीव गोयल
नव प्रकाश
धरा पर उतरे
रश्मि डोर से
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सुनती ही हैं
बोलती जो दीवारें
जाने क्या होता
        -राजीव गोयल
भादों की तीज
तन रहा है छीज
मन सबल
        -डा. रंजना वर्मा
कराते दंगा
कारावास में बंद
राम रहीम
       -विष्णु प्रिय पाठक
पाप का घट
जब भी वो भरेगा
जाएगा फट
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य
पार्क में वृद्ध
ढूँढ़ते फिर रहे
अपनापन
        -राजीव गोयल
चला अकेला
पलट कर देखा
यादों का रेला
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
शब्द प्रणेता
कथ्य के संवाहक
बनाते ग्राह्य
        -डा, रंजना वर्मा
सारा जीवन
पटरी से उतरा
ट्रेन के साथ
       मुकेश शर्मा
आओ गौरैया
मन आँगन ढूँढे
भोर का शोर
       -रमेश कुमार सोनी
मांगता खुशी
टूटते सितारों से
स्वार्थी  इंसान
       -राजीव गोयल
समुद्र बीच
द्वीपों की हरियाली
दिल उर्वरा
       -रमेश कुमार सोनी
मूर्ति भसान
शिल्पी की  मेहनत
जल समाधि
       - अभिषेक जैन
अक्सर रोती
ज़िंदगी भी पिरोती
आंसू के मोती
        -निगम 'राज़'

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