सोमवार, 30 अप्रैल 2018

हिंदी के श्रेष्ठ हाइकु, अप्रेल माह

अप्रेल माह के श्रेष्ठ हाइकु

झील में चाँद
उमस भरी रात
नहाने आया
       सुरंगमा यादव
होते ही रात
चली ख़्वाबों के देश
नींद की नाव
       राजेश गोयल
अग्निशामक
जठराग्नि बुझाती
थाली की रोटी
       विष्णु प्रिय पाठक
नेताजी सोये
लच्छेदार भाषण
रद्दी में रोए
        -पुष्प सिन्धी
बात जुबां पे
अधरों तक दूरी
हुई न पूरी
       -सुरंगमा यादव
नंगा चेहरा
कैसे नहीं पढ़ता
खुली किताब
        -विष्णु प्रिय पाठक
तेरे घर का
ठिकाना मैंने जाना
सुवास आया
       -तुकाराम खिल्लारे
चिकनी राहें
फिसल गईं चाहें
अंधेरी रात
      -पुष्पा सिंधी
कटे जंगल
बढ़ा जंगलीपन
खोया इंसान
      सुरंगमा यादव
चाँद सितारे
आओ न किसी दिन
घर हमारे
      सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
दंगे -फसाद
किराए के बाराती
खूब ही नाचे
      पुष्पा सिन्धी
नीरव वन
धुन मुरलिया की
हर्षाया मन
        -शिव डोयले
मेघ कहार
दूर देश से आया
लेकर जल
       सुरंगमा यादव
लौटे बादल
करके तांका-झांकी
बिन बरसे
       -सुरंगमा यादव
डूब ही गयी
दुःख के सागर में
चाह सुख की 
        -विष्णु प्रिय पाठक
सफ़ेद पुष्प
नागफनी पौधे पे -
बैठी विधवा
        -विष्णु प्रिय पाठक
तपती रेत
नंगे पाँव दौड़ते
स्वप्न अबोध
       -पुष्प सिन्धी
पानी का मूल्य
पूछो रेगिस्तान से
क्या है कीमत ?
        -राजीव गोयल
दिया सहारा
वक्त पर जिसने
वही हमारा
         -सुरंगमा यादव
देखकर भी \
अनदेखा करता
डरा आदमी
      -शिव डोयले
इंसान बन
पढ़ लेना बाद में
गीता कुरान
          -राजीव गोयल
उड़ा ले गई
दिन के आभूषण
चोरनी शाम
       -अभिषेक जैन
चार दीवारी
बने सीलिंग फैन
घूमती नारी   
        -सुरंगमा यादव
उम्र की राह
कभी सकूँ न मिला
उलझी रही
       प्रियंका वाजपेयी 
कितने लोग ...
घिरे ही रहे हम
पर, तनहा
       -प्रियंका वाजपेयी
चख रही हूँ
थकान के दौर में
श्रम का स्वाद
        -प्रियंका वाजपेयी
मांग में भरा
सांवली बदली ने
इन्द्रधनुष
        -राजीव गोयल
पानी बरसा
साफ़ हो गया सारा
मन कलुष
      - राजीव निगम  'राज़'
स्मृति-प्रदेश
हंसता बचपन
विह्वल मन
         -पुष्प सिंधी
हुए अदृश्य
स्वार्थ के कुहासे में
प्रेम के दृश्य
       अभिषेक जैन
नीला आकाश
मिलता ऊंचाई को
महत्त्व ख़ास
          -बलजीत सिंह
मद में चूर
करते कलंकित
पुरुष क्रूर
        सुरंगमा यादव
प्रभात बेला
मंदिर की घंटियाँ
तोड़ें खामोशी
        -राजीव गोयल
घट आकार
बदले कुम्भकार
मृत्तिका वही
         -सुरंगमा यादव
कैसा दुर्योग?
नाम पर आजादी के
भटके लोग
       -सूर्य नारायण गुप्त
सौन्दर्य नष्ट
पाने को नवजात
माँ झेले कष्ट
        -सूर्य किरण 'सरोज'
ठूँठ हूँ अभी
सहने को तैयार
आरी का वार
        -सुरंगमा यादव
तारों का दल
अँधेरे को दिखाए
अपना बल
        सूर्य किरण 'सरोज'
विकृत मन
मासूमों की सुरक्षा
यक्ष प्रश्न सा
        -सुशील शर्मा
भूख तबाही
विकास की बातें तो
हवा-हवाई
        -सूर्य नारायण गुप्त'सूर्य'
राजा व रैंक
सबके लिए सम
मही का अंक
       -सूर्य कारन 'सरोज'
चीर कलेजा
दिखलाती धरती
मेघ पसीजा
       -सुरंगमा यादव
जुगलबंदी -
------------
निखरे भाव
पहन लिए जब
शब्दों के वस्त्र
       -राजीव गोयल
शब्द सहारे
अर्थ पूरित हुए 
भाव हमारे
      -राजीव निगम 'राज़'
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नभ से आई
मुंडेर पर बैठी
नन्ही किरण
       -राजीव गोयल
मन आँगन
थिरकते सपने
ऊर्जा भरते
      -सुरंगमा यादव
भ्रमित युवा
तलाशता है रंग
अंधियारों में
      -सुरंगमा यादव
आँखों में  ख़्वाब
लाया था मैं गाँव से
शहर खा गया
        -अमन चांदपुरी
बच्चे में खोई
माँ सुने किलकारी
पाँव हैं भारी
      -अमन चाँदपुरी
दुखों का मेला
गुज़ार दी ज़िंदगी
रहा अकेला
       सूर्य किरण 'सरोज'
अप्प दीपक
जलाते ही आंधियां
हीन परास्त
        -सुरंगमा यादव
तेल न बाती
निज दीपक बन
जलो संघाती
        -सुरंगमा यादव
अज़ीज़ वक्त
बीता संग हबीब
कज़ा क़रीब
       (उर्दू हाइकु)- अमन चाँदपुरी












शनिवार, 31 मार्च 2018

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - मार्च माह

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - मार्च माह

खेलें वो फाग
बुझ जाए बैर की
दिल से आग
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
रोज़ सुबह
अखबार से आए
खूनी बौछार
      -राजीव गोयल
होली की आग
करे भस्म विषमता
लाए समता
       -डा. रंजना वर्मा
नन्द के लाल
लिए रंग गुलाल
राधा बेहाल
       -सुशील शर्मा
पलाश फूल
धरा पर बिखरा
होली का रंग
       -विष्णु प्रिय पाठक
नन्हीं गौरैया
हो चली है विलुप्त
फाग के गीत
      -विष्णु प्रिय पाठक
मैंने जो रचा
सपनों का घरौंदा
वक्त ने रौंधा
      सूर्य नारायण गुप्त
होली तो होली
पर गांठें मन की
क्या तूने खोलीं ?
       -राजीव गोयल
नभ के गाल
उषा करे ठिठोली
मले गुलाल
     -सुरंगमा यादव
पूर्णिमा रात
चन्द्र घट छलका
बिखरी चांदनी
      -सुरंगमा यादव
खिज़ा की मार
दरख्तों ने खो दिया
रूप श्रृंगार
      -राजीव गोयल
बड़े चुभते
कांच की किरच से
टूटते रिश्ते
       सुशील शर्मा
लाल चूनर
गदराया सेमल
युवा बसंत
      -राम कृष्ण त्रिवेदी 'मधुकर'
जुगलबंदी
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गहन वन
भूलती पगडंडी
अपना पथ
      -शिव डोयले
जीवन रेखा
पगडंडियाँ  होतीं -
पहाड़ों पर
        -राजीव गोयल
 --------------------
फिर उभरा
यादों के दर्पण में
अक्स तुम्हारा
       -सुरंगमा यादव
सूरज उगा
फूलों पर ठिठका
मोती टपका
       डा. रंजना वर्मा
नन्हीं कोंपल
कंकाल दरख़्त पे
नई ग़ज़ल
       विष्णु प्रिय पाठक
मन में भाव
युद्ध अनवरत
कभी न रुके
      -डा. रंजना वर्मा
नारी की व्यथा
द्रोपदी,मीरा, राधा
सीता की कथा
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
रीत जाता है
जीवन अनकहा
बीत जाता है
         -निगम 'राज'
शक्ति स्वरूपा
नारी ही नारायणी
करुणा मूर्ति
       -डा. रंजना वर्मा
अपराजिता.
हर पल प्रिय से
हारती रही
       -सुशील शर्मा
अतिथि जैसा
है महिला दिवस
आया व गया
        -पुष्पा सिन्धी
सबसे न्यारा
जो दूर है सितारा
वही हमारा
       -निगम 'राज़'
सूर्य-घट से
छलके स्वर्ण-कण
रचते धूप
       -कमल कपूर
मन उमंग
स्वार्थ की भीड़ देख
हो गया दंग
       -सूर्य नारायण 'सूर्य'
उठती रही
तेरी याद लहर
मन सागर
       -राजीव गोयल
दौड़ा विकास
टूटी सडकों पर
लुढ़क गया
       विष्णु प्रिय पाठक
उलझे रहे.
शिकायतों का बुना
मकड़ जाल
       सुरंगमा यादव
फूलों की घाटी
हरे-भरे पहाड़
धरा की थाती
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
ख़्वाब बांटती
नीद की गलियों में
बावरी रात
       -कमल कपूर
बिना विवाद
छोड़ देते आसन
पात पुराने
        -सुरंगमा यादव
देह ने किया
साँसों से अनुबंध
सच्चा सम्बन्ध
        -पुष्पा सिन्धी
बड़े शहर
छोटा होता जा रहा
'इंसानी' क़द
        -राजीव गोयल
चूर चूर हूँ
टुकड़े  हुआ अहं
स्व से दूर हूँ
       -प्रियंका वाजपेयी
राधा अनंग
रंगी कृष्ण के रंग
गोपियाँ दंग 
      -निगम 'राज़'
ताली बजाती
जूतों का चित्र बना
बेपैर बच्ची
       -पुष्पा सिन्धी
a bird's nest
will never be broken
it's my house
        -Tukaram khillare
घर मेरा है
घोंसला चिड़िया का
तोडूंगा नहीं
         अनुवाद (सु. व.)
कंक्रीट वन
छाँव बरगद की
ढूँढ़ते खग
     - राजीव गोयल
बदली ऋतु
धूप बदहवास
आँगन रोए
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
देखा दर्पण
भूल गए ढूँढ़ना
चाँद का दाग
      -सुरंगमा यादव
प्यासी गौरैया
नदी के तट पर
सकोरा ढूँढे
       - नरेन्द्र श्रीवास्तव
नन्ही गौरिया
दर्पण निहारती
चोंच मारती
      -सुरेश शर्मा
राग दीपक
गौरैया मार रही
टोंटी पे चोंच
       -विष्णु प्रिय पाठक
प्यासे पखेरू
नदी में तलाशते
दो बूंद पानी
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सजी कविता
पुलकित आखर
श्रृंगार करें
       पुष्पा सिन्घी
खिली धूप  में
होती जब  बारिश
नहाता सूर्य
       -सुरंगमा यादव
गरम हवा
अम्बिया को छू कर
करती जवां
        -सूर्य किरण सोनी
भूला खिलौने
बच्चा बना श्रमिक
प्लेट धो रहा
       -डा, रंजना वर्मा
बारह खड़ी
धूल में उकेरता
श्रमिक पुत्र 
      -डा. रंजना वर्मा
बड़े सकारे
छुट्टन गओ  खेत
भैंस रंभाए
      (बुन्देलखंडी) -नरेन्द्र श्रीवास्तव
तप्त तवे पे
जल बिंदु-सी स्वाहा
क्रोध में मति
        -सुरंगमा यादव
पकते गीत
भावों की अंगीठी पे
कवि के मन
       -राजीव गोयल
बुरा है दौर
लूट के चल दिए
दिन में चोर
        -सूर्य किरण सोनी
उठा सवाल
कब तक बवाल
राम बेहाल
       -डा. रंजना वर्मा
हल्की फुहार
सौन्दर्य का दर्पण
देती निखार
        -वलजीत  सिंह
दृगों के गाँव
बसती छबि राम
स्पंदित प्राण
         -पुष्पा सिंधी
सचेत सीते
कितने ही मारीच
आज घूमते
        -सुरंगमा यादव
आज अचानक
आई कड़वी याद
मन कसैला
        -सुरंगमा यादव
अन्धेरा भी है
जीवन तेरे संग
सवेरा भी है
         -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
जुगलबंदी
-----------
जगत रीत
है झूठा अभिनय
सत्य प्रतीत
        -पुष्पा सिन्धी
जग की रीत
चलदिए पल में
तोड़ के प्रीत
        -सुरंगमा यादव
------------------
घर चौबारे
मेहनत के रंग
सजाते सारे
       -बलजीत सिंह
कैसा स्वराज
कैद है कबूतर
मुक्त है बाज़
       सूर्यनारायण गुप्त 'सूर्य'
जुगलबंदी
-------------
था निर्जीव वो
मिली हवा से सांस
जी उठा बांस
       -राजीव गोयल
मैं बुझा सा था
मिला दोस्तों का साथ
हूँ खिला खिला
       -राजीव निगम 'राज़'
-----------------
--------------समाप्त----------------
     




बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु -फरवरी, २०१८

आँखों ने बोये
जब नींद के बीज
उगे सपने
      राजीव गोयल
घर बाहर
औरत का संघर्ष
कितने मोर्चे
     -सुरंगमा यादव
नारी विमर्श
कहाँ तक सार्थक ?
आकाश पुष्प
      -पुष्पा सिन्धी
ग्रहण काल
प्रारम्भ हुआ अब
भगवा रंग
        -विष्णु प्रिय पाठ
आंसू की स्याही
औरत लिख रही
आग का गीत
       -शिव डोयले
लाल सलोना
मइया दुलारावे
लगा डिठौना
        -डॉ. रंजना वर्मा
ख़त तुम्हारा
सिरहाने पे रखा
सपनों भरा
      -सुरंगमा यादव
छोटी सी बात
उलझी रह गई
खुली न गाँठ
       -सूर्य किरण सोनी
चाबी न ताले
सपनों के महल
बड़े निराले
       -बलजीत
धूप का स्पर्श
खिल उठी कलियाँ
महकी फ़िज़ा
        -राजीव गोयल
खोलो गवाक्ष
झाँक रही झिरी से
भोर किरण
       सुरंगमा यादव
नन्हा दुलारा
छिपा परदे के पीछे
कहता ढूँढो
        सुरंगमा यादव
मिटी न प्यास
हो गई ज़िंदगी
खाली गिलास
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
मेघ बरसे
ठूँठ रहे ठूँठ ही
मूरख जन
      सुरंगमा यादव
रंग न रूप,
प्रतिभा से चमके
जीवन धूप
      *
मिट्टी न धूल
विश्वास से महके
रिश्तों के फूल
       -बलजीत सिंह
पी रही रात
चाँद के सकोरे से
चांदनी जाम
        -राजीव गोयल
जैसा ज़हन
हर किसी की होगी
वैसी कहन
       -निगम 'राज़'
हवा गुज़री
बांसों के ह्रदय में
बजी बांसुरी
       -राजीव गोयल
चन्द्र कलाएं
घटती व बढ़ती
संवेदनाएं
      -पुष्पा सिन्धी
हवा ने छुआ
तालाब के दिल में
स्पंदन हुआ
        -राजीव गोयल
पिघल गई
माँ की प्रकृति सी
मन की व्यथा
    *
छोड़ न पाई
दायित्व, माँ थी न वो
बुद्ध तो नहीं
      -प्रियंका वाजपेयी
विनाश खेल
बेपटरी होकर
खेलती रेल
       -सुरंगमा यादव
वेलैंटाइन डे
-------------
कान्हा है भोला
कोई भी बहका ले
डरे राधिका
       -राजीव गोयल
आँखों में अश्रु
अधरों पर हास
वर्षा में धूप
        -सुरंगमा यादव
प्रेम तुम्हारा
मेरी ताक़त और
मेरा ग़रूर
        *
प्रेम का पौधा
शुभहा की आंधी में
उड़ा समूल
      -सूर्य किरण सोनी
ज़िंदगी जिएँ
भूखे को दो रोटियाँ
'प्रपोज़' करें
       -निगम 'राज़'
मेघ रथ से
उतरी जल परी
वसुधा हंसी
    राजीव गोयल
हंसी में छिपे
जाने कितने राज़
सोच से परे
         -शिव डोयले
दूध क माछी
पड़लि खुद गाढे
अब न नाची
        - भीम प्रजापति
        (भोजपुरी हाइकु)
जुगल बंदी
---------------
एक लालसा
मृग मरीचिका सी
तुम्हें तलाशे
     -सुशील शर्मा
भूला हताशा
चल पडा डगर
लेकर आशा
       -सूर्यनारायण 'सूर्य'
---------------
हँसा फागुन
पुष्पित तन मन
बरसे रंग
        -पुष्पा सिन्धी
चाँद-सितारे
आओ न किसी दिन
घर हमारे
       *
शाम ज्यों ढली
अम्बर में तारों की
झालरें जली
        -सूर्य नारायण 'सूर्य'
कड़ी सुरक्षा
सूरज के घेरे में
पृथ्वी की कक्षा
       -बलजीत सिंह
नन्हे जुगुनू
धरती के सितारे
मन लुभाते
        -डा. रंजना वर्मा
दिल के राज़
चाँद है राज़दार
तन्हा सी रातें
       -सुशील शर्मा
छूने को चन्दा
मचलती लहरें
होड़ मचाएं
       *
सूरज अस्त
समापन नहीं ये
अल्प विराम
       सुरंगमा यादव
मेघ डोली में
बारिश दुल्हनिया
हवा कहार
       -राजीव गोयल
माया का मोह
गुड़ में लगा चींटा
जीवन बीता
        -सुशील शर्मा
रक्त रंजित
मानवता का मुख
धो रहे आंसू
      -सुरंगमा यादव
सुनो तो सही
शान्ति की अभिलाषा
दर्द -ए -दास्ताँ
          -नरेन्द्र श्रीवास्तव
प्यार की धारा
जीवन की नैया को
देती सहारा
        -बलजीत सिंह
दिल की नाव
प्रेम की सरिता में
ले हिचकोले
          -नरेंद्र श्रीवास्तव
चातक प्रेम
आसन्न इंतज़ार
स्वाति की बूँद
         -सुशील शर्मा
जुगलबंदी
------------
आद्र नयन
वियोग का विषाद
पिया की याद
       -सुशील शर्मा
पिया न पास
नयनों से झरती
मिलन प्यास
        -सुरंगमा यादव
---------------
इक ग़ज़ल
खुद के पीछे खड़ी
ज़िंदगी मेरी
          *
गहरी प्यास
उजाला शरबत
पी गई रात
       -पुष्पा सिन्धी
ऋतु अनंग
रतिवासित अंग
मन मतंग
     *
मधुप गान
कलियन वितान
नैनन बान
      -सुशील शर्मा
डाली का फूल
नाज़ुक सी ज़िंदगी
करे क़बूल
      -बलजीत सिंह
फूलों की बातें
हवा हौले से सुने
बुने कहानी
       -पुष्पा सिन्धी
उत्सव बेला
फूलों से सजी खड़ी
बसंत सेना
      - रमेश कुमार सोनी
बीते ज़माने
नीली झील की थाह
कोई न जाने
        -पुष्पा सिन्धी
भोर मुस्काती
सजा रही अल्पना
फूलों के द्वार
       -शिव डोयले
बासंती सिला
भूल जाते मित्रों का
शिकवा गिला
        -भीम प्रसाद प्रजापति
नींद न हँसी
पत्थरों के देश में
प्रीत यूं फंसी
        - सूर्य नारायण 'सूर्य'
चिर उर्वरा
मिट्टी है रत्नगर्भा
सृजन सर्ग
        -सुशील शर्मा
जुगलबंदी
-----------
आंसू से लिखा
पत्र वाँचते रहे
देव पत्थर
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
क्या पता कब
देवता बन जाए
कोई पत्थर
       -सुरंगमा यादव
--------------
आंधी में धूल
अपना ठौर भूल
हुई बावरी
       -सुरंगमा यादव
युगों से खड़े
अधर देहरी पे
शापित गीत
       पुष्पा सिन्धी
दीप डंसते
अंधेरों के भुजंग
दम तोड़ते
       -राजीव गोयल
जय जवान जय किसान
-------------------------
देश की मिट्टी
प्यार से भरी चिट्ठी
माता ने लिखी
        -रंजना वर्मा
खेतों की माटी
चन्दन सी शोभित
कृषक तन
        -सुरंगमा यादव     
-----------------------
स्वर्गीय डा. भगवतशरण अग्रवाल को उनके ८८वें जन्म दिन पर
श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए सत्रह आखर में उनकी पांच श्रेष्ठ रचनाएं -

धन्य है वर्षा
खेतों में कवितायेँ
बोते किसान

लू से झुलसी
जेठ की दुपहरी
कराहे पंखे

फूला पलाश
यादों के दीप सजा
आया बसंत

पसर गई
सरसों फूली शैया
माघ की धूप

कभी न जीती
मौत से जिंदगानी
हार न मानी
-------------------------------
श्रद्धांजलि
-----------
देव गमन
भगवतशरण
सदा स्मरण
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बुझ गई लौ
अब तो चमकेंगे
तारों में हम
        -सुरंगमा यादव
--------------
भोर का फेरा
उजाला नहीं रुका
रोज़ का डेरा
        -रमेश कुमार सोनी
भौंरे बावरे
प्रणय रस दूबे
ऐसे सांवरे
        -निगम 'राज़'
क्या है संयम
अपने ही विरुद्ध
शाश्वत युद्ध
       -राजीव गोयल
रात पूनम
आँगन में चुगता
युगल पंछी
         -विष्णु प्रिय पाठक
माथे पे लिखा
कैसे पढ़ती आँखें
भाग्य विधान
    *
कहना चाहे
मन कितना कुछ
शब्द तो मिलें
       -सुरंगमा यादव
फागुनी फाग
झुर्रीदार गाल पे
खिला गुलाल
      -विष्णु प्रिय पाठक
------------------------------------
---------------------समाप्त -------

बुधवार, 31 जनवरी 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - जनवरी, २०१८

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - जनवरी माह

नूतन वर्ष
जीवन में ले आए
हर्ष ही हर्ष
      बी पी प्रजापति
अभिनन्दन
नव वर्ष तुम्हारा
अतिथि देव
       नरेन्द्र श्रीवास्तव
अभी जन्मा है
जैसा चाहो ढाल लो
साल बच्चा है
       -राजीव गोयल
घर चौबारे
मेहनत के रंग
सजते द्वारे
       -बलजीत सिंह
दिन पहाड़
थक के सोई रात
स्वप्न देखती
      नरेंद्र श्रीवास्तव
लचक गई
हवा का रुख देख
बाल न बांका
       -सुरंगमा यादव
भोर से आस
सांझ से शिकायत
यही ज़िंदगी
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
वक्त कमबख्त
बदले करबट
वक्त बेवक्त
       -डॉ. रंजना
रस्सी सा ऐंठा
गुरूर में अकड़ा
आँखों से गिरा
       -सुरंगमा यादव
दंगा सुर्खियाँ ..
मुंह में रह गया
चाय का घूँट
       -विष्णु प्रिय पाठक
अनाथ बच्चा
मांगे की शर्ट छपा
"ओ मेरी मैय्या "
      विष्णु प्रिय पाठक
जन्म मरण
जीव का व्याकरण
आवागमन
       -निगम 'राज़'
सरे बाज़ार
अपहरित धूप
लोग मौन हैं
       दिनेश चन्द्र पाण्डेय
सागर तट
बालक बना रहा
रेत का घर
      -विष्णु प्रिय पाठक
विश्व हमारा
कुदरत का प्यारा
एक तोहफा
       -वलजीत सिंह
 घरों में उठीं
लालाच की लपटें
बहुएं जलीं
       -राजीव गोयल
शीत शर्बरी
रतिपति चलाए
कुसुम बाण
        *
शीत ऋतु में
नदी पे बन गए
बर्फ के पुल
       -सूर्य करण सोनी
नव वर्ष में
बदलें परिधान
वृक्ष महान
      *
भंवरे गाएं
पल्लवित पुष्पों पे
मधुर गान
        -सूर्य करण सोनी
खंगाला वक्त
चाँद हीरे यादों के
आ गए हाथ
     -राजीव गोयल
अंधेरी रात
कोहरे के व्यूह में
स्ट्रीट लाइट
       -विष्णु प्रिय पाठक
बरछी भाले
आत्मरक्षा की चाह
मौत हवाले
        -बलजीत सिंह
पतंग कटी
ऊंची उड़ान टूटी
धरा पे लुटी
       -निगम 'राज़'
गोधूलि वेला
समेट रहा रवि     
धूप के पर
         -राजीव गोयल
छूना आकाश
संघर्ष है कठिन
उडी पतंग
      *
नभ में देख
पतंगों की उड़ान
पक्षी हैरान
        -सुरंगमा यादव
शीत त्योहार
अलाव के सम्मुख
ठण्ड कथाएँ
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
मैंने जो रचा
सपनों का घरौंदा
वक्त ने रौंधा
       -सूर्य नारायण गुप्त
स्नेह का खेल
सरसों में लिपटी
मटर बेल
       -विष्णु प्रिय पाठक
मन तो रहा
मनमीत में डूबा
दर्द ही सहा
       -निगम 'राज़'
बीहड़ रास्ते
बेपरवाह नदी
मिलन धुन
      -सुरंगमा यादव
बड़ा खज़ाना
बीते हुए वक्त के
वो छोटे लम्हे
       -राजीव गोयल
शाम हो गई
ज़िंदगी का झमेला
लीजे समेट
         -डॉ. रंजना वर्मा
सूखी नदिया
भूखे प्यासे बगुले
टूटी उम्मीदें
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
आया बसंत
आगत स्वागत को
सजा निसर्ग
       दिनेश चन्द्र पाण्डेय
रंग उमंग
नवल कोपलों से
नव सृजन
      -प्रीती दक्ष
पवन बही
भंवर चूम रहे
सुमन सुख
      डा. रंजना वर्मा
बसंत ऋतु
दिन पतंग हुए
रात सरसों
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बसंतोत्सव
मदन साध रहा
पुष्पों के बाण
        -सुरंगमा यादव
बसंतोत्सव
ओढ़ पीली चूनर
झूमी सरसों
        -राजीव गोयल
शाल पलाश
रसवंती कामिनी
महुआ गंध
       -सुशील शर्मा
कोई न सगा
साथी बन सुख का
सब ने ठगा
      -सूर्य नारायण 'सूर्य'
सबका हक़
हमारा गणतंत्र
सबकी हद
       नरेन्द्र श्रीवास्तव
उनका भी हो
गणतंत्र दिवस
मोहताज जो
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
मैदान खाली
मोबाइल ले गया
बच्चों की गेंद
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
सांवरे बिन
नींद न आये चैन
न कटे रैन
      -डा. रंजना वर्मा
राष्ट्रीय पर्व
फेसबुक पे दिखे
तिरंगा ध्वज
      -विष्णु प्रिय पाठक
बहा ले गई
बचपन घरौंदा
वक्त लहर
      राजीव गोयल
सूर्यास्त हुआ
घर घर चमके
अपने सूर्य
      -सुरंगमा यादव
बादल ओट
हटा के चन्दा देखे
कितनी रात 
        सुरंगमा यादव
मौन ही सही
पुकारता तो रहा
अंतर-मन
        -प्रियंका वाजपेयी
खिल न पाई
मन की पूर्णमासी
लगा ग्रहण
        -प्रियंका वाजपेयी 
-----------------------------
---------------समाप्त ----

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - २०१७, दिसंबर माह

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु -२०१७, दिसंबर माह

तुम्हारा मन
चिड़िया सा चहका
मैं क्यों बहका
       -सुशील शर्मा
तुम्हारे लिए
रेत पर उकेरे
मन के भाव
       -सुशील शर्मा
दर्द छिपा है
मन में ऐसे,  जैसे
रेत में नमी
        -सुरंगमा यादव
पाषाण खंड
किनारे से निकली
हरित दूब
       विष्णु प्रिय पाठक

जुगल बंदी --
       *
थर्मामीटर
टेबल पर गिरा
ओस की बूँदें
       -विष्णु प्रिय पाठक
पारा सरीखे
ढलके अश्रु-बिंदु
कपोल भू  पे
       -डा. रंजना वर्मा
        *
शहर बड़ा
हर एक आदमी
अकेला खड़ा
        सुशील शर्मा
कशमकश
तुझे मैं याद रखूँ
या भूल जाऊं
        -सुशील शर्मा
नई कहानी
खुदा की मुझपर
मेहरबानी
        -निगम 'राज़
लफ्जों की लेखी'
रचती इतिहास
पढ़ती सदी
       -निगम 'राज़'
जागा संसार
गंध बाँट सो गया
हरसिंगार
      डा. शिवजी श्रीवास्तव
लगती भली
धूप अगहन की
माँ की गोद सी
       -शिव जी श्रीवास्तव
बनी कहानी
महकी रात भर
रात की रानी
        -निगम 'राज़'
लापरवाही
कागज़ न कलम
खरीदी स्याही
       -बलजीत सिंह
सत्संग हॉल
लाउडस्पीकर से
शान्ति का पाठ
         -अभिशेख जैन
दिव्यांग बाला
मुख से बना रही
हाथ का चित्र
        -विष्णु प्रिय पाठक
मन धरती
नव आशा अंकुर
लहक उठा
       -सुरंगमा यादव
भौरों का कोप
मुरझा गए फूल
डरी कलियाँ
        -अमन चांदपुरी
आंधी तूफ़ान
बादलों की ओट में
छिपा सूरज
        -शिव डोयले
मन नाविक
तन नौका लेकर
दौड़ता फिरे
       -सुरंगमा यादव
मन है ऐसा
निपुण निदेशक
नाच नचाए
       -सुरंगमा यादव
भट्टी की राख
ढूँढ़ते घूमे कुत्ते
ठण्ड में रोते
        सुरंगमा यादव
रश्मि के पैर
चल पड़े करने
धरा की सैर
        अभिषेक जैन
रवि ने बुना
किरणों के धागे से
धूप दुशाला
       -राजीव गोय
लक्ष्य विहीन
इत उत डोलती
जीवन नैया
       -सूर्य किरण सोनी
स्वर्ण रश्मियाँ
झिलमिल नदिया
दीपशिखा सी
        -सरंगामा यादव
शब्द कांटे भी
गुलाब के जैसे भी
छूकर देखें
         -नरेन्द्र श्रीवास्तव
नारी जीवन
आँगन की तुलसी
काशी मथुरा
       -शिव डोयले
आसमां परे
ज़रूर कुछ तो है
खोजे परिंदा
       जितेन्द्र वर्मा 
पूस की ठण्ड
रात खोजती रही
सूर्य दुशाला
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
ओढ़ रजाई
शाम से सोया सूर्य
उठा देर से
       सुरंगमा यादव
भाई है खूब
कतरा भर मिली
जाड़े की धूप
       -निगम 'राज़'
निर्मल जल
बहता कल कल
पर्वत पुत्र
      -डा. रंजना वर्मा
रहता रोता
बहता हुआ सोता
चुप न होता
        -डा. रंजना वर्मा
हम हैं तने
समय के सामने
विद्रोही बने
      -निगम 'राज़'
नाजों से पाला
पिजरा जब खुला
तोता जा उड़ा
        दिनेश चन्द्र पाण्डेय
तप में लीन
धवल वसन में
खड़ा  हिमाला
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
दस्तक भोर
उजालों ने उखाड़ी
रात कनात   
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
स्वाति बूंद-सा
प्रेम बना है मोती
मन सीपी में
      सुरंगमा यादव
बड़े ज्ञाता हो
मौन का अनुवाद
कर पाओगे  ?
      -पुष्पा सिन्धी
कैसी गरीबी
बदल लें नज़र
लोग करीबी
       -बलजीत सिंह
ढूँढे न मिले
गौरैया व आँगन
दोनों ही गुम
       -सुरंगमा यादव
छोटा जीवन
किन्तु महत्वपूर्ण
जैसे वसंत
       -निगम 'राज़'
सबको भाता
देहरी पे सूरज
जब भी आता
       -निगम 'राज़'
पिता का मन
मधुर नारियल
बाहर सख्त
       -सुरंगमा यादव
बर्फ सी सर्दी
धुनियाँ की दूकान
हुई सफ़ेद
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
विद्या विहीन
कुर्सी पर पसरे
हम ही चुनें
        -विष्णु प्रिय पाठक
भरने न दें
कलेजे के ज़ख्मों को
यादों के तीर
         -राजीव गोयल
सूप ज़िंदगी
दुःख नमक बिना
बड़ी ही फीकी
       -राजीव गोयल
पूस की रात
कम्पित दीप की लौ   
दादी के हाथ
         -विष्णु प्रिय पाठक
हर दीवाली
भगाया दरिद्दर
रहे निर्धन
       सुरंगमा यादव
तडपे प्यासी
एक स्वाति  के लिए
पानी में सीप
       -राजीव गोयल
ऋतु हेमन्त
प्रकोष्ठ में कांपती
गुलदावरी
        -विष्णु प्रिय पाठक
माँ के हाथ की
घी चुपड़ी पनेथी
यादों में शेष
        -सुरंगमा यादव
अम्मा का ख़त
आँख हो गई नम
सीली फिजाएं
       -राजीव गोयल
जलते बल्ब
रात पहाड़ पर
तारे जा  बसे
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
सूर्य को देख
अकेला चमकता
लाखों में एक
      बलजीत सिंह     
दौड़ती हुई
न जाने कहाँ चली
व्यस्त ज़िंदगी
        -प्रियंका वाजपेयी
मैके की याद
छौंक रही बहू
दाल के साथ
       -अभिषेक जैन
 जीवन पोथी
श्वेत पृष्ठ है कोई
कोई धूमिल
       -सुरंगमा यादव
जो स्मृतियाँ हैं
मन के आँचल में
तितलियाँ हैं
      - निगम 'राज़'
पुरवा आई
चन्दन वन से वो
खुश्बू लाई
        -सूर्य नारायण गुप्ता 'सूर्य'
गर्दन झुका
जोड़े मोबाइल में
अंजाने रिश्ते
        *
गर्दन तान
तोड़ देता अपने
पुराने रिश्ते
       - राजीव गोयल
नीरव रात
व्याकुल पुकारता
मन पपीहा
       -सुरंगमा यादव
पहाड़ यात्रा
सौन्दर्य की बारातें
नाचती आँखें
        दिनेश चन्द्र पाण्डेय
प्यारा सा गाँव
तालाब का किनारा
नीम की छाँव
       बलजीत सिंह

जुगल बंदी

ठूँठ पे बैठा
एक अकेला पक्षी
दोनों उदास
       सुरंगमा यादव
अकेला पंछी
रहेगा कब तक
ठूँठ के साथ ?
        -राजीव गोयल
---------------------
रेत बिखरी
सागर के किनारे
मोती न मिले
        डॉ रंजना वर्मा
पूस की धूप
जवानी से पहले
आया बुढ़ापा
        -सुरंगमा यादव
सैंटा की राह
मैया देखती रही
वृद्ध आश्रम
        - अभिषेक जैन
मर्यादा मान
लक्ष्मण रेखा जैसी
ना जाना लांघ
       -सूर्य किरण सोनी
मन पिघला
बह चली आँख से
करुणा धार
        -सुरंगमा यादव
कैसे बढाएं
अमन का क़दम
लुटे हैं जूते
        -विष्णु प्रिय पाठक
तीन तलाक़
हंसती ज़िंदगी से
किया मज़ाक़
       -भीम प्रसाद प्रजापति
छोटा अनार
हज़ार मोतियों का
उठाए भार
      -बलजीत सिंह
आंसू देकर
नींद हमारी लेकर
हा ! सोए तुम
       -सुरंगमा यादव

जुगलबंदी
-----------
लिख रहा हूँ
ज़िंदगी की किताब
वक्त के पन्ने
       शिव डोयले
लिख रही है
ज़िंदगी की किताब
वक्त की स्याही
        राजीव गोयल
-------------
भौरों ने गाया
फूल बनती गईं
कलियाँ सभी
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
म्यूजियम में
बनावटी पुतले
शहरी लोग
      -सुरंगमा यादव
नव डायरी
लिखूँ तेरा ही नाम
अधूरा ख़्वाब
       -विष्णु प्रिय पाठक
सरक रहा
छोड़ याद केंचुली
पुराना साल
       -राजीव गोयल
नव वर्ष में
करें नए संकल्प
बीती बिसार
         -सुरंगमा यादव
नव वासर
हर पल नवीन
बुनता साल
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय     
-------------------------------
------------------समाप्त ----

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - नवम्बर माह

नवम्बर माह के हाइकु

चल रही है
शरद आगमन
नशीली हवा
       *
नर्म हो रही
चिलचिलाती धूप
बर्फीली हवा
        -प्रियंका वाजपेयी
मिट्टी जो खुदी
परतों में दफ़न
महल मिला
       *
यादें अपनी
दफ्न मन में हुईं
ढूँढें न मिलीं
        -प्रियंका वाजपेयी 
अपना गाँव
झोंपड़ी झोंपड़ी को
देता सहारा
        *
गाँव हमारा
खंडहर हो गया
प्यार खडा है
        -विष्णु प्रिय पाठक
लूट ले गया
मेरा उम्र खज़ाना
वक्त लुटेरा
        -राजीव गोयल
डूबता चाँद
झील के उस पार
देवदास सा
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
उठने लगी
आँगन में दीवार
खामोश हम
       *
दीवार पार
भाई का परिवार
इधर हम
      -डा. रंजना वर्मा
धरा की पीड़ा
हिल गया पर्वत
बेफिक्र हम
       -विष्णु प्रिय पाठक
जीवन चाक
सुख दुःख की माटी
गढ़े आकृति
        -शिव डोयले
बदले चोले
रूप बदल गए
स्वरूप वही
       -राजीव गोयल
ऋतु बदली
भूला अपना शूल
केक्टस फूल
       -विष्णु प्रिय पाठक
बरछी भाले
आत्मरक्षा की चाह
मौत हवाले
       -बलजीत सिंह
सांध्य संगीत
गायों के गले बंधीं
घंटिया बजी
        -सुशील शर्मा
रास्ते बंजारे
घूमते यहाँ वहां
रुकें न कहीं
       -भावना सक्सेना
कैसा ज़माना
अपना ही खज़ाना
लूटें चाभियाँ
        -सूर्य नारायण 'सूर्य'
चलते रहे
छालों से भरे पाँव
राह न रुकी
        डा. रंजना वर्मा
नभ के तारे
तोड़ लाऊँगा सारे
देने सौगात
        -सूर्य किरण सोनी
छलक पड़ा
तट पर आते ही
नाव का दर्द
       -शिव डोयले
संजो के रखे
डायरी गुल्लक में
यादों के सिक्के
       -राजीव गोयल
तैरते रहे
झील सी अंखियों में
गुज़रे लम्हे
        -शिव डोयले
भूखा बालक
माँ गई है करने
रेसिपी क्लास
      -अभिषेक जैन
फूलों की झोली
बिखर जाने पर
बने रंगोली
      -वलजीत सिंह
प्रत्येक पौधा
पर्यावरण हेतु
बना है योद्धा
        -वलजीत सिंह
उड़ने लगे
शोहरत पाकर
खोखले लोग
      सूर्य कारन सोनी
ठंडी सुबह
दांतों के ताल पर
थिरके देह
       -राजीव गोयल
बाल दिवस
सफ़ेद हाथी पर
बच्चे सवार
       -विष्णु प्रिय पाठक
घनी नींद में
दादा के कंधे सटा
बाल दिवस
      -विभा श्रीवास्तव
रिहा हो गया
ठण्ड की पैरवी से
कैदी कम्बल
      -अभिषेकजैन
पर्वत बने
एकता में पत्थर
अटूट खड़े
       -सुशील शर्मा
मचाएं शोर
रात की खामोशी में
तुम्हारी यादें
        -राजीव गोयल
ध्रुम कोहरा
बच्चे, पिल्ले बिल्लियाँ
कुचले गए
       -विभा श्रीवास्तव
अटकी पड़ी
वायु प्रदूषण में
सांस की साँसें
         -अभिषेक जैन
सर्द लहर
निकलती रातों में
करे शिकार
       -राजीव गोयल
दर्पण कहे
स्वागत में तो रहो
कुछ न गहो
        -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
सर्द मौसम
गर्म चिता की राख
सो रहा श्वान
       -राजीव गोयल
मुस्काता  पौधा
लगता है बच्चों सा
आँगन मेरे
       सुशील शर्मा
वृद्ध आश्रम
वृद्धा के सिरहाने
बेटे की फोटो
       -अभिषेक जैन
मेरा शहर
हाथ में लिए आरी
छाँव तलाशे
       सुशील शर्मा
मेंहदी लिखे
तेरी हथेली पर
मेरा ही नाम
       -शिव डोयले
एक थी नदी
आने वाली पीढियां
सुने कहानी
        -सुशील शर्मा
दर्द का गीत
नयनों से बहता
भीगा दामन
        -डा. रंजना वर्मा
ठिठुरी हवा
भीगा पातों का गात
शीशिर रात
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
चांदनी रात
सितारों के आँगन
सजे बरात
         -वलजीत  सिंह
मन बगिया
कलरव करते
यादों के पंछी
        -सुरंगमा यादव
याद में तेरी
मुस्काई मैं, पगली
कहता जग
       -सुरंगमा यादव
मुनिया रूठी
घोड़े बने दादा जी
दुम हिलाते
         -विष्णु प्रिय पाठक
दब न सकी
तोड़ शिला का दर्प
मुस्काई दूब
         -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
शीत लहर
देती रही दस्तक
द्वार न खुले
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
पल रहे हैं
जाने कितने गम
हंसी के नीचे
        -राजीव गोयल
हुए अलग
पेड़ों से जब पत्ते
कुचले गए
       -राजीव गोयल
उदय-अस्त
सूर्य रहे समान
महापुरुष
       -सुरंगमा यादव
पानी बरसा
नथुनों में समाई
माटी की गंध
        -डा. रंजना वर्मा
बेटा बीमार
वृद्धाश्रम में पिता
है परेशान
       -राजीव गोयल
बाहर नहीं
भीतर ह्रदय में
बैठे हैं हम
        -सुशील शर्मा
फटी रजाई
छेदों भरा कम्बल
ठण्ड बैरन
       -डा. रंजना वर्मा
कपडे ढेर
किसी के पास, कोई
ठण्ड से ढेर
        -सुरंगमा यादव
देता है बलि
प्रभु की खुशी हेतु
मूर्ख मानव
          -सूर्य करण सोनी
ओस मानिंद
माथे पर झलके
श्रम का स्वेद
        -सुशील शर्मा
दादा की सांस
बारह पे कांपती
घड़ी की सुई \
        -विष्णु प्रिय पाठक
नई सुबह
पाई फिर हमने
करें सार्थक
      सुरंगमा यादव
चले ज़िंदगी
हथेली पर बनी
पगडंडी पे
       -राजीव गोयल
दिन की धूप
जाड़े ने खोल दिए
नींद के कोष
         -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
डर को भूत
मन में घुसो जैसे
हवा में जाड़ो
         (बुन्देली हाइकु) - सुशील शर्मा
रोता सावन
तर-बतर होता
मेरा दामन
       -निगम 'राज़'
टूटा बंधन
साथ निभाता जाए
अकेलापन
       -निगम 'राज़'
ढूँढ़ ही लाया
मन फिर जीने का
कोई बहाना
       -सुरंगमा यादव
चाहे जिसको
उसी पर झल्लाए
निष्ठुर मन
        -सूर्य करण  सोनी
थिरकी उषा
अमिया डार, कभी
दूब के सिर
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
मन हो गया
जहाज़ का पंछी
तुम से मिल
       -सुरंगमा यादव
सुबह शाम
दुनिया का व्यापार
दो दूनी चार
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय

जुगल बंदी

जीवन खेत
लहराते रिश्ते
स्नेह का पानी
     सुशील शर्मा
जीवन खेत
उगी प्यार फसल
उपजे रिश्ते
      -राजीव गोयल

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