मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु / अक्टूबर माह

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - अक्टूबर माह

मनाओ रोज़
पहली अक्टूबर
दिन वरिष्ठ
     डा. सुरेन्द्र वर्मा
दादा के ख़ास
किताबें चश्मा लाठी
ढेर दवाएं
     नरेन्द्र श्रीवास्तव
आई बरखा
पात पात हरखा
जीवन धन्य
     -डा. रंजना वर्मा
गिर जाते हैं
समय की शाखों से
उम्र के पन्ने
        -अमन चांदपुरी
पत्ते आश्रम
वर्षा-बूँदें ठहरें
तो कभी ओस
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
पल खुशी के
फूल पे बैठी ओस
भाग्य सराहे
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
गोधूलि वेला
समेटे सूरज ने
धूप के पंख
       -राजीव गोयल
शब्द ही शब्द
ढूँढ़ते हैं भीड़ में
अपने अर्थ
      -मनीषा सक्सेना
याद दरख़्त
कभी नहीं सूखता
होता सघन
       -डा. रंजना वर्मा
धूप ने दिए
धरती को जो ज़ख्म
छाँव ने सिए
        -राजीव गोयल
यह तुम हो
या चाँद पूनम का
हैरत में हूँ
       -शिव डोयले
पूनों की रात
बेकरार लहरें
छूने को चाँद
       -राजीव गोयल
दूध की खीर
है छत पर टंगी
मन अधीर
     सुशील शर्मा
ये जिंदगानी
क्षण भर की ही है
झूठी कहानी
       -सूर्य नारायण 'सूर्य'
घूँघट काढ़े
बदरी का दुपट्टा
आया है चाँद
       -जितेन्द्र वर्मा
चढती रात
ओर निखर आया
चाँद का नूर
       दिनेश चन्द्र पाण्डेय
भागता मन
विगत की गली में
यादें खोजता
       -शिव डोयले
शुभ्र धवल
नदिया में बहती
चन्द्र किरण
       -सुशील शर्मा
निकला चाँद
छलनी से बरसे
श्वेत किरण
      विष्णु प्रिय पाठक
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगड़ाई
      -वलजीत सिंह
जल-प्रपात
पृथ्वी को प्रकृति का
एक सौगात
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
भोर-किरण
शहनाई की धुन
बेटी हमारी
      -शिव डोयले
सर्द मौसम
पहाड़ ओढ़े खड़े
श्वेत कम्बल
      राजीव गोयल
कितनी बार
टहनी तोड़ डाली
फिर से उगी
      - तुकाराम खिल्लारे
उतरी रात
सांझ की सीढियों से
बिना आहट
      -राजीव गोयल
घट जाएगा
तम का ये पसारा
दीप हुंकारा
      -जगदीश व्योम
दीपक जला
हार कर अन्धेरा
पैरों में गिरा
      राजीव गोयल
सूर्य से होड़
करे सुबह का तारा
नभ चकित
       -जीतेन्द्र वर्मा
दीप प्रकाश
अँधेरे के रथ पे
छुए आकाश
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
ऊधो का देना
न ही माधों से लेना
घोंघे का सुख
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
बिखेरे जुल्फें
पहाड़ों से उतरी
सांवली रात
       -राजीव गोयल
नन्हे  बल्बों में
गुम हो गया दीया
तेल-गंघ भी
     -डा. जगदीश व्योम
रोशनी दी है
रंगीन झालरों ने
दीया उदास
      -निगम 'राज़'
फूटे पटाखे
दीप में भरा तेल
उछल पडा
      -विष्णु प्रिय पाठक
कल का पल
चला गया मुझसे
कर के छल
      -सूर्य नारायण 'सूर्य'
अकेला चाँद
देख रहा भू पर
फैला उन्माद
      -भीम प्रजापति
पीड़ा बरसी
आंसू से भर गईं
झील सी आँखें
      नरेन्द्र श्रीवास्तव
खुशी जो मिली
आंसू झट आ गए
यादें लेकर
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
यादों की नाव
मन के सागर में
गोते लगाए
      -राजीव गोयल
भूख से मौत
खबर सुनकर
रोटियाँ आयीं
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बाज़ार ऐसा
सलाह और धोखे
मिलते मुफ्त
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
अंधे बहरे
चीखती रही वह
देखा न सुना
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सखा कन्हैया
सिंगार संवारत
लेत बलैयां
       -प्रीती दक्ष
है भर जाता
त्यौहार दीवाली का
समरसता
       निगम 'राज़'
कर बस में
ख्वाहिशों का रथ
सारथी तू ही
       -राजीव गोयल
पंछी जुलाहा
तिनकों से बुनता
नीद की काया
       -राजीव गोयल
महल बड़े
गरीब दुखियों की
लाश पे खड़े
        -विष्णु प्रिय पाठक
वीरान आँखें
पहचान खोजती
बीते कल की
        -शिव डोयले
नज़रें मिलीं
अनकहे उतरी
दिल पे बात
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
शिशु गोद में
सपनों का संसार
माँ की आँखों में
         -नरेन्द्र श्रीवास्तव
मिटा फासला
मन घट ढलका
रस छलका
       -डा. रंजना वर्मा
मन हिरना
चहके दिन रात
धरे धीर ना
       -भीम प्रजापति
किया विकास
न्यू बुलेट पे बैठा
ग्राम प्रधान
       -विष्णु प्रिय पाठक
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समाप्त 

शनिवार, 30 सितंबर 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - सितम्बर माह

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - सितम्बर माह

मन दीवार
बीते सालों की खूँटी
पे यादें टंगी
      -राजीव गोयल
सत्य का पाँव
भटक रहा आके
झूठ के गाँव
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
सन्न था कागा
कूकी जो घोंसले में
काली काकली
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
बेजान बांस
स्पर्श कन्हाई का पा
जीवंत हुआ
       -राजीव गोयल
क्षितिज भाल
संध्या लगाती टीका
सूर्य सा गोल
       -शिव डोयले
शिक्षक देता
खुद को तपाकर
ज्ञान प्रकाश
       -डा. जगदीश व्योम
जागो इंसान
शिक्षा का आभूषण
बढाए मान
       -निगम 'राज़'
शिष्य आईना
शिक्षक का व्यक्तित्व
प्रतिबिंबित
       -सुशील शर्मा
मेहर गुरु की
बरसे बारिश सी
मिले संतुष्टि
       -डा. पूर्णिमा राय
अंधियारे से
गुरु करते सचेत
दें दिव्य ज्ञान
      डा. पूर्णिमा राय
गुरु जिसने
मिलाया ईश्वर से
उसे नमन
      -डा. रंजना वर्मा
ग़म गुप्त हो
और खुशी लुप्त हो
कौन तृप्त हो
       -सुशील शर्मा
शापित मन
इधर से उधर
भटके तन
       -राजीव 'राज़'
वर्षा थमी तो
नभ खोले खिड़की
सूरज झांके
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बढे कदम
अँधेरे मार्ग पर
मिले न छोर
       -सूर्य किरण सोनी
लम्बी सी जीभ
सड़कें चाट गईं
कई जंगल
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
बूढा मकान
दीवारों से झांकते
नीम पीपल
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
अंतर्मन में
गहरे उतरना
ध्यान करना
       -डा.रंजना वर्मा
गाते हैं पेड़
पाखियों के परों से
छूते आकाश
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
रौद्र लहर
आकर तट पर
हो जाती शांत
      -सूर्य करण सोनी
रात ने पिया
दिन का कोलाहल
हुई बेसुध
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
भोर हुई तो
रात जाकर छुपी
दिया के तले
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
शब्दों के रत्न
सजते पन्नों पर
बनाती नज़्म
      -राजीव गोयल
पा गए ठांव
पर्वतों की गोद में
पहाडी गाँव
      -सूर्य नारायण 'सूर्य'
शान है हिन्दी
भारत की जुबान
हिन्दी महान
       -भीम प्रसाद प्रजापति
शिव मस्तक
शोभित अर्ध चन्द्र
शोभा अनूप
       डा. रंजना वर्मा
यमुना तीरे
हंसता हुआ चाँद
कृष्ण का रास
       -डा. रंजना वर्मा
नदी का नीर
धक्के खा किनाकों से
सहता पीर
       -भीम प्रसाद प्रजापति
मुस्काए तुम
बन गई ग़ज़ल
शायर फिजां
       -प्रियंका वाजपेयी
कभी व्योम में
तलाशा वजूद को
कभी खो दिया
      - प्रियंका वाजपेयी
फूलों की घाटी
हरे-भरे पहाड़
धरा की थाती
       -सूर्यनारायण गुप्ता
पेड़ ने ओढी
पत्तियों की छतरी
मिला सुकून
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
ऊंचे पहाड़
डर के भागी नदी
नीचे ही नीचे
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
पड़ी फुहार
प्रसन्न हुआ मन
बूंदों ने छुआ
       -शिव डोयले
मेरा व्यापार
आनंद का बाज़ार
सारा संसार
       निगम 'राज़'
मन उमंग
स्वार्थ की भीड़ देख
हो गया दांग
      सूर्य नारायण गुप्त
फूलों की झोली
बिखर जाने पर
बने रंगोली
       -बलजीत सिंह
कातिल हैं वे
मसीहा भी लगते
मेरे ये दोस्त
       -सुशील शर्मा
पुराने पल
अलमारी में मिले
खतों में बंद
       -राजीव गोयल
बरखा विदा
तितलियाँ हाल पूछें
आके फूलों का
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
कैसा दस्तूर
बेगाने नज़दीक
अपने दूर
       -वलजीत सिंह
घड़ी की सुई
सदा चलायमान
किसकी हुई
       -भीम प्रसाद प्रजापति
खोजा जगत
रावण वध  हेतु
राम न मिला
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
नारी की व्यथा
द्रोपदी मीरा राधा
सीता की कथा
        -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'

रविवार, 20 अगस्त 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - अगस्त माह

अगस्त के श्रेष्ठ हाइकु-

मौन हैं जब
स्तब्ध सी धड़कने
अपने छूटे
     -प्रियंका वाजपेयी
धुलती धरा
उड़े सौंधी खुशबू
लौटा यौवन
      -प्रियंका वाजपेयी
बारूदी हवा
देश में ऐसी चली
रो उठी गली
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
चांदनी छाई
धरती पे चांदी की
पर्त बिछाई
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
वर्षा की बूँदें
शांत वातावरण
पत्तों पे बैठीं
      -अमन चांदपुरी  
सावन पर्व
मेंहदी रचे हाथ
देखे आईना
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सावन गीत
वर्षा की बूंदों संग
युगलबंदी
      नरेन्द्र श्रीवास्तव
बरसा पानी
प्यासी नदी ने पिया
जी भर पानी
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सज्जित व्योम
सितारों की चमक
लुभाती मन
       डा. रंजना वर्मा
आसमान में
मुस्कुराते पूर्वज
बनके तारे
       -प्रियंका वाजपेयी
उठा देरसे
आँखें मींचते हुए
शीत का सूर्य
       -अमन चाँदपुरी
सजी कलाई
बचपन की फोटो
राखी की यादें
        -डा. पूर्णिमा राय
श्रावणी पूनों
नेह कथा बांचते
रेशमी धागे
        -डा. शिवजी श्रीवास्तव
खुशी असीम
बहन की राखी में
शुभ सगुन
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
स्नेह बंधन
महकाए सम्बन्ध
बने चन्दन
      -मुकेश शर्मा
ज़िंदगी सच
दौड़ने का पर्याय
शान्ति मुहाल
       -प्रियंका वाजपेयी
रक्षा कवच
भाई की कलाई पे
रेशम धागा
      -सुशील शर्मा
सुनो ओ चाँद
निखर आए तुम
ग्रहण बाद  
      -सुशील शर्मा
सूर्य किरण
पृथ्वी पे यूं दौड़ी
स्वर्ण किरण
    -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
झूठ के पाँव
शहर से आ गए
हमारे गाँव
    सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
बिटिया रानी
छोटी सी उम्र में
हुई सयानी
     -सूर्य किरण सोनी
चलते रहे
रात दिवस पाँव
स्वप्न के गाँव
       -अमन चांदपुरी
चुरा ले गया
पतझर पाहुन
कपडे लत्ते
     डा. मिथलेश दीक्षित
लिपटी रही
सूखने के बाद भी
लता वृक्ष से
      -शिव डोयले
लूट ले गया
दरख्तों का वैभव
ये पतझड़
     राजीव गोयल
शाम ढलते ही
झालरें सितारों की
नभ में टंगी
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
ऊंचा होकर
छाया देने की कला
पेड़ से सीखो
       -अमन चाँदपुरी
फागुन मास
धरा पर चांदनी
करे विलास
       -बलजीत सिंह
ठंडी अंगीठी
गरीब के घर में
जुर्म पकाती
        -राजीव गोयाल
पंख पसार
निकले नभचर
नीड़ की और
       -सूर्य किरण सोनी
जन्म से शुरू
ज़िंदगी का दरिया
बहे ताउम्र
       -प्रियंका वाजपेयी
ठंडे सम्बन्ध
लगता जम गए
मुंह में शब्द
       -राजीव गोयल
देह धरा से
चुगे साँसों के मोती
समय हंस
        -शिव डोयले
मेरा जीवन
ज्यों लम्बी किताब
नीरस पन्ने
      -अमन चांदपुरी
बनूँ तिरंगा
लहराएगी आत्मा
चुकाऊँ ऋण
       -मुकेश शर्मा
जूझे गोपाल
आक्सीजन की हांडी
मिल न सकी
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
ज़रा ठहरो
महसूस तो करो
मौन का स्वर
      -डा. रंजना वर्मा
तन्हाइयों में
ले यादों की डोरियाँ
बुनूँ अतीत
       राजीव गोयल
कैसी आजादी
शरीफों के घरों को
 लूटें फसादी
        -सूर्य नारायण गुप्त "सूर्य"
नीला गगन
पहाड़ों की गोद में
दिखे मगन
        -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
नीयत सच्ची
मेहनत की रोटी
लगती अच्छी
       बलजीत सिंह
लूट के भागा
घर का सुख चैन
सोने का मृग
       -राजीव गोयल
डाली का फूल
नाज़ुक सी ज़िंदगी
करे कबूल
       -बलजीत सिंह
गीता कुरान
इनके नाम पर
चले दूकान
     -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
दुःख की आंच
ठहरे हुए आंसू
बहने लगे
      -शिव  डोयले
बादल रोया
आसमान का दर्द
धरा ने जाना
       शिव डोयले
छोड़ घोंसले
उड़ चले परिंदे
छूने गगन
        -राजीव गोयल
नव प्रकाश
धरा पर उतरे
रश्मि डोर से
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सुनती ही हैं
बोलती जो दीवारें
जाने क्या होता
        -राजीव गोयल
भादों की तीज
तन रहा है छीज
मन सबल
        -डा. रंजना वर्मा
कराते दंगा
कारावास में बंद
राम रहीम
       -विष्णु प्रिय पाठक
पाप का घट
जब भी वो भरेगा
जाएगा फट
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य
पार्क में वृद्ध
ढूँढ़ते फिर रहे
अपनापन
        -राजीव गोयल
चला अकेला
पलट कर देखा
यादों का रेला
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
शब्द प्रणेता
कथ्य के संवाहक
बनाते ग्राह्य
        -डा, रंजना वर्मा
सारा जीवन
पटरी से उतरा
ट्रेन के साथ
       मुकेश शर्मा
आओ गौरैया
मन आँगन ढूँढे
भोर का शोर
       -रमेश कुमार सोनी
मांगता खुशी
टूटते सितारों से
स्वार्थी  इंसान
       -राजीव गोयल
समुद्र बीच
द्वीपों की हरियाली
दिल उर्वरा
       -रमेश कुमार सोनी
मूर्ति भसान
शिल्पी की  मेहनत
जल समाधि
       - अभिषेक जैन
अक्सर रोती
ज़िंदगी भी पिरोती
आंसू के मोती
        -निगम 'राज़'

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----------------------------------------------------------samaapt

शनिवार, 22 जुलाई 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु / जुलाई माह

जुलाई के श्रेष्ठ हाइकु

नभ ने भेजा
बादल टेंकर से
धरा को जल
      नरेन्द्र श्रीवास्तव
छलक पड़ा
तट पर आते ही
नाव का दर्द
       शिव डोयले
प्रेम का पेड़
मुश्किल से उगता
जड़ गहरी
      -सुशील शर्मा
बेताल कथा
आतंकी सुना रहा
अपनी कथा
       विष्णु प्रिय पाठक
गहरी आँखें
बुज़ुर्ग ढूँढ़ रहा
अपनी लाठी
       -विष्णु प्रिय पाठक
स्वप्न परी सा
कितना भव्य झूला
इंद्र धनुष
      डा. रंजना वर्मा
रैन बसेरा
करें स्वप्न के पंछी
सुबह उड़ें
       डा, रंजना वर्मा
जुगल बंदी
-----------
सुबह से ही
हो रही रिमझिम
भीगा है मन
       जितेंद्र वर्मा
मेघों से घिरा
अम्बर का विस्तार
भीगी है धरा
      -प्रियंका वाजपेयी
---------------
देता रहा है
दिल पर दस्तक
ज़मीर सदा
       -प्रियंका वाजपेयी
लिखी धूप ने
वृक्षों की कलम से
छाँव की कथा
        -राजीव गोयल
बरसा पानी
प्यासी नदी ने पिया
जी भर पानी
       नरेन्द्र श्रीवास्तव
अपनापन
मुस्कान की छुअन
छलके मन
      -सुशील शर्मा
बड़े मित्र का
कर रहे स्वागत
भोर के तारे
       विष्णुप्रिय पाठक
मिले ही नहीं
बिछड़े सौ सौ बार
कैसा ये प्यार
       मंजूषा मन
धीरे बोलिए
है फूल अभी सोया
धूप उतार
       तुकाराम खिल्लारे
नैनों में नमी
बारिशों का मौसम
रोया है कोई
        प्रियंका वाजपेयी
कुछ लमहे
दफ़न तो होते हैं
मरते नहीं
        प्रियंका वाजपेयी
गुरु वरण
तेजोमय संस्कार
आत्म प्रदीप्त
       -सुशील शर्मा
अपना गुरु
बैठा है अंतर में
सुनो तो सही
         -जितेन्द्र वर्मा
गुरु पारस
छू लेता जिसको भी
करे कुंदन
        -राजीव गोयल
गुरु पूर्णिमा
मधुशाला में बैठे
शिष्य आचार्य
       -विष्णुप्रिय पाठक
गिनू कितने
यादों के ये मोती
माला दुःख की
       तुकाराम खिल्लारे
बरसा पानी
कागज़ की नाव पे
स्वप्न सवार  
      नरेन्द्र श्रीवास्तव
नमी हवा में
आँखें भी हुईं नम
पानी न आया
       -जितेन्द्र वर्मा
मकड़ जाल
गिरफ्त में मच्छर
बना आहार
       -विष्णुप्रिय पाठक
तैरते गीत
यादों के समुद्र
लय तुम्हारी
       -जित्रेंद्र वर्मा
पत्तों ने थामी
बरसात की बूँदें
नीड़ बचाने
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सहा  न जाए
खामोशियों का शोर
कुछ तो बोल
        -राजीव गोयल
डरी रोशनी
घने बादल देख
छिपने लगी
        -डा. रंजना वर्मा
उन्हें नमन
सीमा ओर चले
जो बाँध कफ़न
        -सूर्य नारायण गुप्त
मन का सूप
फटके जीवन की
छाँव और धूप
        -सूर्य नारायण गुप्त
सखियाँ साथ
मेहदी लगे हाथ
ऋतु सावन  
        डा. रंजना वर्मा
जुगलबंदी
------------
मिट्टी में सोया
बूंदों ने सहलाया
जगा अंकुर
      डा. रंजना वर्मा
जगा अंकुर
नन्हा पौधा बनके
बूंदों ने सींचा
      -जितेन्द्र वर्मा
----------------
शब्दों में ढली
भावों की अभिव्यक्ति
रचना बनी
        -शिव डोयले
बजे नगाड़े
मेघों की पालकी में
वर्षा पधारे
       -राजीव गोयल
डरी रोशनी
घने बादल देख
छिपने लगी
       -डा. रंजना वर्मा
श्वास संगीत
सुर लय ताल में
बजाए गीत
      -निगम 'राज़'
पावस पर्व
मेघ समूह करे
जल तर्पण
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
वर्षा जो आई
धरा की तबीयत \
हरी हो गई
       -नरेन्द्र शीवास्तव
मन का मोर
बरखा में नाचता
धूप में खडा
      -तुकाराम खिल्लारे
सारे के सारे
संबंधों के पाये हैं
रिश्ते हमारे
        -राजीव निगम 'राज़'
नारी की व्यथा
द्रोपदी मीरा राधा
सीता की कथा
        -सूर्य नारायण गुप्त
सावन गीत
वर्षा की बूंदों संग
युगलबंदी
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सावन स्वप्न
कागज़ की नाव से
सैर सपाटा
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
कहे न कोई
ब्रह्म तत्व का ज्ञान
गूंगे का स्वाद
        -कैलाश कल्ला
बूँदें पाज़ेब
धरती को छूते ही
छम से बजीं
        -नरेंद्र श्रीवास्तव
मेघ ने भेजी
सावन सगुन की
बूंदों की बिंदी
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
यादों के धागे
बन रहे अतीत
वर्तमान में
       -राजीव गोयल
रास्ते बनाके
चलते रहें हम
अपनी राह
      -राजीव निगम 'राज़'
राह निहारें
मृदुल भावनाएं
मन के द्वार
       -डा. रंजना वर्मा
dead end ?
look, and go back
take another road
         Jitendra varma
आई किरण
संवार कर केश
चल दी निशा
        --राजीव गोयल
फूलों की झोली
बिखर जाने पर
बने रंगोली
      -वलजीत  सिंह
बादल काले
नील गगन पर
काजल डाले
      -वलजीत सिंह
जुगल बंदी
-------------
अब की बार
सावन विकराल
जल का ज्वार
       -सूर्य करण सोनी
जल उफान
हाहाकारी अवस्था
जीव विनाश
        -राजीव निगम 'राज़'
-----------------------
टूटी जो डोर
उड़ चला विहंग
फैलाए डैना
        -प्रियंका वाजपेयी
स्वप्न सुन्दर
विचार रहा मन
सब्ज़ बाग़ में
       -प्रियंका वाजपेयी
सिंदूरी शाम
गोधूल भरी वेला
लौटता धाम
        -सुशील शर्मा
कोमा में गया
फिर जागा ही नहीं
मेरा ज़मीर
       -आर पी शुक्ल
       (जितेन्द्र वर्मा के सौजन्य से )
पता पूछती
अमावस की रात
चाँद खोजती
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बरछी भाले
आत्मरक्षा की चाह
मौत हवाले
       बलजीत सिंह
झूठ फरेब
इन सबका मन्त्र
भर लो जेब
       -बलजीत सिंह
बरसे नहीं
हनक दिखा गए
काले बादल
      दिनेश चन्द्र पाण्डेय
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगडाई
       बलजीत सिंह
अब्रे बहार
इतना तो बरस
जा न पाए वो
       -डा. रंजना वर्मा
लिख गीत में
गुलाब की सुगंध
कांटे का दर्द
       -शिव डोयले
बहती हवा
बहका ले जाती है
मेरे मन को
       -अमन चाँदपुरी 

गुरुवार, 29 जून 2017

जून माह के श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु, माह जून

बीच में रखें
एक कप चाय का
हो बातचीत
      -जितेन्द्र वर्मा
तेरा सामीप्य
हर दिन लगता
तीज-त्यौहार
      शिव डोयले
दीप की माला
अमावस सघन
तम गहन
      सुशील शर्मा
जुगलबंदी
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प्यार के छंद
लिख रही राधिका
गाती बांसुरी
     -शिव डोयले
प्रीत की धुन
होठ लगी बांसुरी
मधुर गीत
      -प्रियंका वाजपेयी
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ओस की बूंद
पुष्प पंखुरी पर
मुक्ता सदृश
       -डा. रंजना वर्मा
पर्यावरण
ज़हर भरा धुआं
खांसते लोग
       -विष्णु प्रिय पाठक
अपने बच्चे
चोंच मार उड़ाती
माता चिड़िया
       -जितेन्द्र वर्मा
मन की वीणा
गीत बुनती साँसें
ताल स्पंदन
       -प्रियंका वाजपेयी
जोत रहे हैं
असंतुष्ट किसान
हिंसा के खेत
        -अभिशेख जैन
आई न वर्षा
खेतों में उग रही
क़र्ज़  फसल
        -राजीव गोयल
ज्येष्ठ की धूप
आँगन में पसरी
हक़ जताए
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
ज़िंदगी गुत्थी
सुलझाना मुश्किल
जीना आसान
       -जितेन्द्र वर्मा
तुलसी चौरा
आस्था भरा आँगन
दीया ज़िंदगी
      -रमेश कुमार सोनी
सूरज पिता
माता है वसुंधरा
प्राण नियंता
        -सुशील शर्मा
नारी की व्यथा
द्रौपदी, मीरा, राधा
सीता की कथा
        -सूर्य नारायण गुप्त
उदास दादी
वृद्ध माँ को रुलाता
पुत्र फसादी
        -सूर्य नारायण गुप्त
तैरती रही
तन्हाई के सिन्धु में
यादों की किश्ती
        राजीव गोयल
प्रेम के आँसू
निरंतर बरसे
पाने को प्रेम
       -कैलाश कल्ला
उगले आग
रोष में है प्रकृति
मानव जाग
      भावना सक्सेना
मन का तन
दर्द के पैरहन
साँसें लिबास
       -सुशील शर्मा
ढलता सूर्य
कर रहा इशारा
मौत न दूर
       -अभिषेक  जैन
निर्झर काव्य
बहता चहुंओर
बटोरे कवि
       -जितेन्द्र वर्मा
लौट रही हैं
अनमनी लहरें
तट तटस्थ
       -राजीव गोयल
कबाड़ हुए
ज़माना गुज़रते
लोग सामान
        -रमेश कुमार सोनी
किस्सों के गाँव
गप बेचे बाज़ार
देते उधार
       -रमेश कुमार सोनी
अपने लगे
कुर्सी पाने के बाद
सपने लगे
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
खून का रंग
सब धर्मों का एक
फिर क्यों फर्क ?
       -सुशील शर्मा
प्रात: घुमाने
आलसी मालिक को
टौमी  ले जाता
        -राजीव गोयल
स्त्री के दायरे
देह के इर्द-गिर्द
कैसे निकलें?
       -सुशील शर्मा
उदास  दिन
न करने को कुछ
यादों ने घेरा
       -जितेन्द्र वर्मा
स्वाती नक्षत्र
पुनर्वसु बरसे
मन हरसे
      -विष्णु प्रिय पाठक
झाँक रही हैं
खिड़की के शीशे से
वर्षा की बूँदें
      -राजीव गोयल
घटा फासला
दिल से मिला दिल
बना घोंसला
        -निगम 'राज़'
पिता  की सेवा
सबसे बड़ी पूजा
ईश्वर दूजा
        -प्रदीप कुमार दाश 'दीपक'
बारिश बूँदें
आँखों से छलकतीं
चुभता मौन
      -तुकाराम खिल्लारे
ओढ़ के मौन
सहता ही रहा मैं
नित्य छलावा
        -प्रियंका वाजपेयी
मन की व्यथा
अपने ही न जाने
फिर क्या गिला ?
        -प्रियंका वाजपेयी
दोनों ही सही
बस यही बात तो
गलत होती
        राजीव गोयल
है जिंदगानी
सिंदूरी रंगों वाली
शाम सुहानी
        -निगम राज़
झरो ओ मेघ
बरस लो सतत
बुझे तपन
         -सुशील शर्मा
नभ में मेघ
उड़ता जाता हंस
पराए देश
      विष्णु प्रिय पाठक

start listening
what the air says
even in whispers
        Jitendra Varma
दीप्ति बदन
विद्युत् से नयन
स्पंदित मन
       -सुशील शर्मा
खौफ में घर
बस्ती में आग लगी
विश्वास जला
         -रमेश कुमार सोनी
पढ़ाते वर्ण
हाथ पकड़ पिता
मुस्कुराती माँ
        -तुकाराम खिल्लारे
तेरे दीद से
नसीब होगी खुशी
आज ईद पे
       -निगम 'राज़'
नई कोंपलें
बैठी हुई बेख़ौफ़
शाख की गोद
       -राजीव गोयल
बजने लगीं
मंदिर में घंटियाँ
गोधूली वेला
       -राजीव गोयल
monsoon
thunderstorm
a continuous weep
      -Jitendra varma
warm coffee
turned icy cold
a wait worthwhile
        Jitrendra Varma
 जुही सी कली
जग उपवन में
माली ने छली
       -प्रदीप कुमार 'दाश
सूखता जिस्म
धरती की दीवारें
हत चेतन
        -सुशील शर्मा
एक सैलाब
बहा कर ले गया
सारे सपने
       -सुशील शर्मा
घमंड तनी
उतुंग इमारतें
धूल में मिलीं
       - सुशील शर्मा

बुधवार, 31 मई 2017

मई माह के श्रेष्ठ हाइकु

मई माह के श्रेष्ठ हाइकु

पहली मई 
माथे पर पसीना 
श्रम दिवस 
       -जितेन्द्र वर्मा
श्वेद तरल
श्रम है अविरल
नव निर्माण
       -सुशील शर्मा
विकास रथ
मुझसे गुज़रता
हूँ अग्नि पथ
       -सुशील शर्मा
नींद ले उडी
सपनों की पतंग
भोर ने काटी
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
नींद बागबां
सपनों के फूलों से
प्रीत महके
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बेचे सपने
सपनों का व्यापारी
ये मेरा मन
       -जितेन्द्र वर्मा
वही कहानी
फिर टूटे सपने
वर्षों पुरानी
      -विष्णु प्रिय पाठक
जीवन तेरा
सिल पर निशान
हाइकु जैसा
      -प्रीती दक्ष
जीता लड़ाई
ज़िंदगी हार कर
वीर सिपाही
      -राजीव गोयल
ज़िंदगी स्वप्न
सच मान कर जी
वाह, ज़िंदगी
        -जितेन्द्र वर्मा
गोधूलि बेला
होने लगा शिथिल
सूरजमुखी
       -राजीव गोयल
रस्म नापाक
भविष्य हुआ ख़ाक
तीन तलाक
      -डा. रंजना वर्मा
झड़ा पलाश
सज गई है सेज
पेड़ों के नीचे
      -राजीव गोयल
व्रती विहग
धूप जाने के बाद
दाना चुगते
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
नींद से जगी
अलसाई सी कली
स्वप्न महका
      -सुशील शर्मा
स्वप्न की नाव
नींद की नदी पर
तैरती रही
       -सुशील शर्मा
माडर्न आर्ट
विभा सुलझा रही
वर्ग पहेली
       -विभा श्रीवास्तव
कहा मौन ने
अहसास ने सुना
दर्द मन का
      -प्रियंका वाजपेयी
रूप यौवना
दर्पण सखी सदा
नहीं परदा
      रमेश कुमार सोनी
पीड़ा किसी की
असह्य थी, मगर
खामोश रही
       -प्रियंका वाजपेयी
दिल दर्पण
दिखलाए हमेशा
बिम्ब अपना
       -कैलाश कल्ला
और से नहीं
अपने से ही लड़ें
पाएं विजय
       -जितेन्द्र वर्मा
माँ मेरी मित्र
गंगा जैसी पवित्र
ईश्वर चित्र
       -सुशील शर्मा
पी रहा हूँ मैं
घोल कर शराब
तनहा रात
      -राजीव गोयल
हिंसा अहिंसा
रास्ते दो लड़ने के
कोई तो चुनें
      -पीयूषा
अहिंसा प्यार
साधे हित सभी का
सत्य की राह
      -पीयूषा
स्थिर हो चित्त
भटकते सिद्धार्थ
बैठे तो बुद्ध
       -सुशील शर्मा
सेल्फी का दौर
हर कोई तनहा
कौन अपना
      -अमन चांदपुरी
जाते ही जान
छाया भी छोड़े साथ
काहे का मान
      -अमन चांदपुरी
भीतर ज्वाला
बाहर हिमगिर
ऐसी है धरा
       -प्रियंका वाजपेयी
नन्हा बालक
थोड़ी सी झरी हंसी
मानो हाइकु
       (संपादित)  -तुकाराम खिल्लारे
संचित अन्न
गोदाम में ही सड़ा
जनता भूखी
       - जितेन्द्र वर्मा
वैसाखी धूप
बरगद की छाँव
बनी बैसाखी
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
श्याम की छवि
यमुना में समाई
सांवरी भई
      डा. रंजना वर्मा
सहे न सर्दी
झेली न जाए गर्मी
इन्सां अझेल
       -प्रियंका वाजपेयी
दहका जब
सूरज का तंदूर
पकी फसलें
       -राजीव गोयल
तुम्हारी यादें
तपी दुपहरी में
स्निग्ध छाया सी
     -सुशील शर्मा
अकेला साया
जाना पहचाना सा
तनहा चला
      -सुशील शर्मा
अक्स उसका
उसी रोज़ ही चन्दा
झील हो गया
       -विष्णु प्रिय पाठक
मौन ही सही
कहलवा लेती है
खामोशी सब
        -प्रियंका वाजपेयी
खो गई याद
अंतर मन कहीं
ढूँढ़ न पाया
       -जितेन्द्र वर्मा
फिर आओ माँ
बच्चा मुझे बना के
दुलाराओ माँ
       -निगम 'राज़'
बीज झांकते
धरा आँचल खोल
वृक्ष बनने
       -रमेश कुमार सोनी
अम्मा का प्यार
झरता है निर्झर
अनवरत
       -सुशील शर्मा
देखा न खुदा
माँ में ही देख रहा
उसका नूर
      -कैलाश कल्ला
जैसा था बोया
वैसा ही काटा, फिर
काहे का घाटा
       - अमन चाँदपुरी
धूप का कर्फ्यू
चिड़िया भूखी बैठी
दुखी पीपल
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
तीखी किरणें
धूप धरे तेवर
धरा है मौन
      -प्रियंका वाजपेयी
खोखला करे
चाहतों की नींव को
गरीबी घुन
       -राजीव गोयल
हवा का झोंका
आकाश में तैरते
सेमल बीज
       -विष्णु प्रिय पाठक
कुछ न किया
निठल्ले बैठे बैठे
नींद ने घेरा
     -जितेन्द्र वर्मा
ज्येष्ट की धूप
खाली गागर लिए
पानी खोजती
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
छोटा सा बीज
अंजुरी भर पानी
कुनमुनाया
       -सुशील शर्मा
नन्हा सा बीज
मुस्कुराता हंसता
धरा से फूटा
       -सुशील शर्मा
लगा सदमा
मुरझाई तुलसी
चल बसी माँ
      -अभिषेक जैन
धूप दबंग
बाहर निकले
तो पसीना छूटे
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाँव चौपाल
पीपल चौरा देता
पंचों का न्याय
       -रमेश कुमार सोनी
जुगलबंदी
*******
वट के घर
राहगीरों का रेला
छाँव उत्सव
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
पीपल नीचे
राहगीरों का मेला
ताड़ अकेला
      -राजीव गोयल
----------------
पिरोता रहा
आंसुओं की डोरी में
यादों के मोती
      -राजीव गोयल
सोना बखेरें
सूरज की किरणें
सागर वक्ष
     -जितेन्द्र वर्मा
थिरकी खूब
बनकर बाराती
दारू की घूँट
      -अभिषेक जैन
मुद्दत बाद
फिर जली अंगीठी
खुश रसोई
       -राजीव गोयल
सुबह शाम
सूरज की लालिमा
तुम्हारे नाम
       -निगम 'राज़'
बदला वक्त
तारा आसमान का
ज़मीं पे गिरा
      -राजीव गोयल
घर में बेटी
तुलसी का बिरवा
स्वर्ग का द्वार
       -सुशील शर्मा
चलते रहे
जिह्वा की कमान से
शब्दों के तीर
      -राजीव गोयल
छत में दिखे
चौदहवीं का चाँद
दो पाटों फंसा
       रमेश कुमार सोनी
नम है हवा
क्या रात भर तुम
रोईं थीं कल ?
       -राजीव गोयल
लड़ा के हवा
भागी आवारा हवा
लगा दी आग
        -राजीव गोयल
प्रीत की डोर
जोड़े ही रखिएगा
बात गहन
       -प्रियंका वाजपेयी
जीवन मृत्यु
सुबह और शाम
पूर्ण विराम
      -शिव डोयले
शाम हो गई
थक गया शहर
आस खो गई
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव